Sunday, January 26, 2014

Aam Aadmi is not the reforming party India needs, Financial Times,January 26, 2014

The leadership is trapped in the ideas of the old left, writes Gurcharan Das

For the past six weeks Indians have been mesmerised by the stunning success of the Aam Aadmi party, which has propelled its 45-year-old activist leader, Arvind Kejriwal, to chief minister of Delhi. The AAP – or Common Man party – is only a year old but its popularity is challenging the supremacy of India’s two main political parties, the left-leaning Congress and the Hindu nationalist Bharatiya Janata party.
Yet despite its many commendable features, the AAP is not the party needed to revive investment and growth and unlock India’s potential. Mr Kejriwal’s gentle, charming rhetoric seems to hide illiberal instincts. His party, furthermore, could prevent the formation of a stable government in this year’s national elections if it diverts enough votes from Narendra Modi of the Bharatiya Janata party, the leading contender.

The AAP has rapidly given many Indians a wonderful sense of nationhood. Its transparent fundraising contrasts with the murky electoral financing of other parties. Its strident rhetoric has forced parliament to enact anti-corruption legislation that had been languishing for years. Its politicians’ frugality has embarrassed those of other parties who live in sprawling bungalows with gun-toting security brigades.

A young, aspiring middle class, sick of corruption, is largely driving the AAP phenomenon. Filled with hope and ambition, it wants jobs, opportunities and a better life for its children. But the party’s leadership is trapped in the ideas of the old left and could take India back to its socialist past, the pre-1991 days when it was a perpetual underachiever. Since the leadership is out of sync with the aspirations of its followers, the party may yet hit a wall and run out of steam. It is a fate that has been met by many populist movements before.

The AAP failed its first economics test this month when it disallowed foreign investment in Delhi supermarkets. It did not realise that its supporters would prefer to work in modern supermarkets rather than dingy localkirana stores. It forgot that, the world over, the “common man” shops in supermarkets where prices are lower because large retailers shun intermediaries to buy their produce directly from farmers, passing on the savings to consumers.

Instead of fighting supermarkets, the AAP should have scrapped a law that forces farmers to sell through
official “agricultural produce marketing committees” – in effect, wholesaler cartels. This would benefit consumers, curbing rises in fruit and vegetable prices. It would also, for example, allow supermarkets to buy directly from farmers, keep the produce fresh throughout the supply chain and save food from rotting in the field.

The man in charge of running one of India’s leading cities has the opportunity to transform it into an innovative services hub, and to lift his supporters to the affluence enjoyed in the Asian tiger economies. But Mr Kejriwal does not realise that, since the arrival of the metro over a decade ago, Delhi has changed from an old bureaucratic town of constipated civil servants to become a lively commercial city.

His first move was to give all households 20,000 litres of free water a month – a populist ploy that will not help the poorest 30 per cent of Delhi citizens who are without running water. This middle-class subsidy will lead to meter-tampering and destroy the finances of the publicly owned water authority, leaving scant funds for maintenance, or for laying new pipes in poor neighbourhoods.

What makes Mr Kejriwal unique is his obsession with corruption. But to tackle it he will have to go beyond his favourite idea, the Lokpal, an independent anti-corruption agency with the power to expose wrongdoing by officials. At a minimum, he must eliminate opportunities for official malfeasance by reforming the bureaucracy and the judiciary. He has shown little inclination for this hard work.

Indian voters, unfortunately, do not have a choice when it comes to economic issues. Every party is left of centre; hence, reforms take place by stealth.

The space at the right of centre remains empty. More than the AAP, India needs a liberal party that openly trusts markets and focuses on economic and institutional reform. But this situation might soon change. Mr Modi is openly right of centre. Even though his own party is confused on economic issues, his state of Gujarat has registered double-digit economic growth for more than a decade through his ability to attract private investment. He may not be the liberal reformer India needs but he is decisive, business friendly and gets things done.

No party seems capable of winning a majority in the forthcoming elections, and voters are reconciled to another coalition. The AAP’s role might well be that of a spoiler, which will mean instability in a country where decision making has been paralysed for the past five years under Congress party rule.

The writer is the author of ‘India Grows at Night: A Liberal Case for a Strong State’

Saturday, January 25, 2014

आप से ज्यादा उम्मीद नहीं

आम आदमी पार्टी को दिल्ली चुनावों में मिली सफलता से तमाम भारतीय नागरिक मंत्रमुग्ध हैं। आम आदमी पार्टी का नेतृत्व 45 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल के हाथों में है, जो फिलहाल दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं। यह पार्टी महज एक साल पुरानी है, लेकिन इसकी अपार लोकप्रियता भारत के दो प्रमुख राजनीतिक दलों-वाम नीतियों के प्रति झुकाव रखने वाली कांग्रेस और हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी की सर्वोच्चता को चुनौती पेश कर रही है। अपनी तमाम प्रशंसनीय विशेषताओं के बावजूद आप वह पार्टी नहीं है जो अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर ला सके अथवा रोजगार और विकास के संदर्भ में भारत की क्षमताओं को बढ़ा सके। वास्तव में यदि आप आगामी चुनावों में पर्याप्त सीटें जीतती है तो यह प्रमुख प्रतिद्वंद्वी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक स्थिर सरकार की संभावना को अस्थिर कर सकती है।
बहुत कम समय में आप ने तमाम भारतीय नागरिकों को राष्ट्रीयता के संदर्भ में एक नया और चमत्कारिक नजरिया दिया है। आप ने जिस पारदर्शी तरीके से चुनावी चंदा इकट्ठा किया वह दूसरी तमाम पार्टियों के लिए शर्म का विषय होनी चाहिए। इस पार्टी ने भ्रष्टाचार के मसले पर जिस तरह का कड़ा रुख अख्तियार किया उसने संसद को भ्रष्टाचार रोधी कानून लोकपाल को पारित करने के लिए विवश किया। इस पार्टी के सादगी भरे आचरण ने बड़े बंगलों में रहने वाले और भारी सुरक्षा का तामझाम रखने वाली दूसरी पार्टियों के नेताओं को शर्मिदा होने के लिए विवश किया। युवाओं और मध्य वर्ग की आकांक्षाओं तथा भ्रष्टाचार की महामारी जैसे कारक इसकी चमत्कारिक सफलता के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं।
इस संदर्भ में यह भी एक तथ्य है कि नई उम्मीद और आकांक्षाओं से भरा हुआ यह वर्ग रोजगार के नए अवसर तथा अपने बच्चों के लिए एक बेहतर जीवन की उम्मीद रखता है, लेकिन दुर्भाग्य से आम आदमी पार्टी का नेतृत्व भारत के पुराने वामपंथी विचारों में जकड़ा हुआ है। यह भारत को 1991 से पूर्व के उस समाजवादी अतीत में ढकेल सकता है, जब हमारा देश कोई खास प्रगति नहीं कर सका था। यदि आप नेतृत्व अपने समर्थकों की आकांक्षाओं को नहीं समझता है तो पार्टी को बहुत जल्द नुकसान पहुंच सकता है और तमाम अन्य लोकप्रिय आंदोलनों की तरह यह भी अपनी लोकप्रियता खो सकती है।
विगत सप्ताह में आप अपने पहले आर्थिक इम्तिहान में फेल साबित हुई। इसने एक गलत धारणा के आधार पर सुपरबाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को इसलिए अनुमति देने से इन्कार कर दिया कि इससे सुपरबाजार में नौकरियां खत्म होंगी। वह इस बात को नहीं समझ सकी कि इसके समर्थक किसी गंदे किराना स्टोर में काम करने की बजाय एक आधुनिक सुपरबाजार में काम करना पसंद करेंगे। वह भूल गई कि विश्व में सभी जगह आम आदमी अथवा कॉमन मैन सुपरबाजार से सामान खरीदना पसंद करते हैं, क्योंकि यहां कीमतें अपेक्षाकृत कम होती हैं। यहां कीमतें इसलिए कम होती हैं, क्योंकि बड़े खुदरा व्यापारी किसानों से सीधे उत्पाद खरीदते हैं और बिचौलियों की भूमिका नहीं होने के कारण बचने वाला लाभ उपभोक्ताओं को मिलता है।
सुपरबाजार पर प्रहार करने की बजाय आप किसानों को अपना उत्पाद कृषि उत्पाद विपणन समितियों को बेचने के लिए विवश करने वाले कानून को खत्म करती ताकि फल और सब्जियों के दाम नीचे आते। थोक बाजार को खुला करने से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और व्यापारी किसानों से सीधे सामान खरीद सकेंगे, जिससे महंगाई घटेगी।
सभी घरों को 20 किलोलीटर नि:शुल्क पानी देने का विचार बेतुका है। इससे दिल्ली के 30 फीसद गरीबों को कोई मदद नहीं मिलेगी। सब्सिडी की नीति से गरीबों के घर तक पाइपलाइन बिछाने अथवा आधुनिक विकास कार्यो के लिए धन नहीं बचेगा। इसी तरह कैग द्वारा बिजली कंपनियों की ऑडिट से बिजली की आपूर्ति नहीं बढ़ने वाली, बल्कि इससे बिजली क्षेत्र में निवेश और हतोत्साहित होगा। असल में कंपनियों के खातों का ऑडिट पेशेवरों द्वारा होना चाहिए न कि राजनीतिक रूप से अभिप्रेरित सीएजी द्वारा, जो बिजनेस की बारीकियां नहीं समझता। 2002 में जब से दिल्ली की बिजली कंपनियों का निजीकरण हुआ था, बिजली के वितरण में नुकसान और बिजली चोरी 57 प्रतिशत से घटकर 17 प्रतिशत रह गई है। इस बीच जितनी लागत बढ़ी है उतने रेट नहीं बढ़े हैं। 2002 से बिजली की लागत 300 प्रतिशत बढ़ चुकी है जबकि बिजली दरों में मात्र 70 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। अगर केजरीवाल ऊर्जा वितरण में सुधार चाहते हैं तो उन्हें बिजली कंपनियों का एकाधिकार तोड़कर उनकी संख्या बढ़ानी चाहिए ताकि आपसी प्रतिस्पर्धा बढ़े। प्रतिस्पर्धा बढ़ने से कम दाम में बेहतर सेवा मिल सकेगी।
भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों का स्टिंग ऑपरेशन और दिल्ली विश्वविद्यालय में सीटें आरक्षित करने का विचार भी सही नहीं है। भ्रष्टाचार के प्रति कड़ा रुख केजरीवाल की असाधारण विशेषता है। किंतु इससे निबटने के लिए केजरीवाल का प्रमुख उपाय जनलोकपाल सही नहीं ठहराया जा सकता। इससे अधिकारियों की शक्ति घटेगी और प्रशासन, पुलिस व न्यायपालिका में जरूरी सुधार लागू नहीं हो पाएंगे।
दुर्भाग्य से आर्थिक मुद्दों पर भारतीय मतदाताओं के पास कोई विकल्प नहीं है। भाजपा के अलावा हर पार्टी का झुकाव वाम की तरफ है और वे खुद को समाजवादी कहलाने में गर्व महसूस करते हैं। दक्षिण की तरफ झुकाव का स्थान रिक्त है। आप के बजाय भारत को एक ऐसी उदारवादी पार्टी की जरूरत है जो अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए खुलकर बाजार पर भरोसा करे न कि नौकरशाही और राजनेताओं पर। ऐसी पार्टी को आर्थिक और संस्थागत सुधारों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। किंतु यह स्थिति जल्द ही बदल सकती है। प्रधानमंत्री पद के भाजपा के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी दक्षिण की ओर झुकाव वाले हैं और फिलहाल देश में सबसे अधिक लोकप्रिय भी हैं। यद्यपि उनकी खुद की पार्टी आर्थिक मुद्दों पर भ्रम का शिकार है, किंतु उनका राज्य गुजरात एक दशक से भी अधिक समय से दोहरे अंकों में आर्थिक विकास कर रहा है। इससे मोदी की निजी निवेश को आकर्षित करने की क्षमता का पता चलता है। वह एक उदारवादी सुधारक नहीं हैं, जिसकी भारत को सबसे अधिक आवश्यकता है, किंतु वह फैसले लेने वाले, व्यापार को बढ़ावा देने वाले और चीजों को दुरुस्त करने वाले व्यक्ति हैं।
आगामी चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलता नजर नहीं आ रहा है और भारतीय मतदाता किसी नए गठबंधन पर विचार कर रहा है। फिलहाल चुनावी दौड़ में मोदी सबसे आगे चल रहे हैं, किंतु बहुत से लोगों का मानना है कि आम आदमी पार्टी इतनी सीटें ले जा सकती है कि मोदी एक स्थिर सरकार का गठन न कर पाएं। इस प्रकार आगामी चुनाव में आप खेल बिगाड़ने की ऐतिहासिक भूमिका अदा कर सकती है। इसका सीधा अर्थ यह होगा कि देश में अस्थिरता छा जाएगी। पिछले पांच साल से कांग्रेस पार्टी की फैसले लेने की पंगुता जग-जाहिर है।

Sunday, January 19, 2014

Inflation, not corruption, will be the key issue in LS polls

In the last assembly elections, the aam admi complained inconsolably of rising prices. TV clips showed voters quoting the prices of potatoes, onions, and dal. Pundits put it down to the ‘usual election whining’, but more than corruption, inflation turned out to be the reason for Congress’ defeat. Even though it has slowed a bit recently, all political parties are warned — the aam admi is not going to forget the pain of inflation in the coming general election. 

Economists have struggled to understand why India’s consumer prices have been rising 10% a year for the past five years when prices in the world have been reasonably steady. Even in poor, emerging economies, prices have risen at half the rate as India’s. Inflation is complex but it has become clear that India’s inflation is the result of the same bad policies that brought down our growth. Huge government spending without commensurate production has meant that too much money has been chasing too few goods. 

UPA II put massive funds into villagers’ pockets. Rural wages thus rose an unprecedented 15% a year in the last five years. Farmers received a bonanza — they got high minimum support prices for grains besides fertilizer and energy subsidies plus loan waivers. Rising wages are a good thing when they reflect climbing demand in a prospering economy. To an extent, this is true of India, which experienced a ‘golden age’ of growth and prosperity till 2011. These rising incomes changed the aam family’s food habits — eating fewer cereals and more protein, fruits and vegetables. But escalating rural wages have also been the result of ‘make work’ jobs of NREGA, which did not create productive assets. Had the same money been invested in factories, roads and power plants, prices would not have risen to this extent. 

The obvious answer to inflation is to revive economic growth. To its credit, the government has realized its mistake, and is desperately trying to approve projects that have been stuck for years in red and green tape. But investments take time to translate into jobs and growth. There are quicker ways to tame food inflation fortunately. One of them is to scrap ‘agricultural produce marketing committees’ (APMC), which function as wholesaler cartels in mandis rather than protecting small farmers. Like most of our bad economic ideas, this is a hangover from Indira Gandhi’s socialist days. 

Freeing wholesale markets will bring competition as traders and farmers are able to buy and sell freely. International retailers will be able to buy directly from farmers, and with their formidable cold-chains, they will also save food from rotting in the fields and mandis. This will result in higher returns to farmers and also lower prices to consumers as supermarkets will pass on the savings from bypassing middlemen. Economists have been urging the scrapping of APMCs for years. Rahul Gandhi has now discovered this idea, and since he has put his weight behind it, it might get implemented in the Congress-ruled states. Powerful local politicians, however, control APMCs — let’s watch if Rahul Gandhi has it in him to take on this powerful vested interest. 

The Aam Aadmi Party’s (AAP) first action should have been to scrap the APMC in Azadpur Mandi near Delhi. It would have brought quick relief to consumers by curbing prices of fruits and vegetables. But it did the opposite. AAP scrapped foreign investment in supermarkets, denying aam admi the potential for lower prices. It did not realize that around the world it is the aam admi who shops in supermarkets because of lower prices. Besides, AAP’s aspiring supporters would any day prefer to work in modern supermarkets rather than in kirana stores. 

Of our three main political parties, only the Congress seems to have understood that inflation can be controlled by APMC reform and foreign investment in supermarkets. The BJP has chosen the trader against the aam admi and opposes FDI in retail. The AAP’s leadership, oddly enough, does not seem to be in sync with the aspirations of its followers. It is trapped in old ‘povertarian’ ideas of the Old Left which ensured that India remained an underachiever. Given the crucial role that prices will play in the coming election, can the Congress convert its advantage into votes?