Tuesday, April 08, 2014

चयन का सही आधार

आने वाले कुछ सप्ताह में मैं मतदान करने के लिए जाऊंगा। मतदान बूथ पर मेरा सामना खामियों-खराबियों वाले उम्मीदवारों से होगा, लेकिन मेरे सामने उसे चुनने की मजबूरी होगी जिसमें सबसे कम खामी होगी। यहां सवाल यही है कि किस आधार पर मैं अपनी पसंद के उम्मीदवार का चयन करूं? सामान्य सी बात है कि मैं उस उम्मीदवार को वोट देना पसंद करूंगा जो करोड़ों भारतीयों के जीवन में संपन्नता-समृद्धि लाने में मददगार हो। इस संदर्भ में भ्रष्टाचार, महंगाई, सेक्युलरिज्म और आतंकवाद जैसी बातें भी अपेक्षाकृत कम महत्व रखती हैं। कोई भी भारतीय तब तक चैन से नहीं रह सकता जब तक कि सभी भारतीय अपनी जरूरतों को पूरा करने के संदर्भ में दिन-प्रतिदिन की चिंताओं से मुक्त नहीं हो जाते। सभी राजनेता गरीबों के प्रति अपनी चिंता दर्शाते हैं, लेकिन करोड़ों गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के भारतीय गरीबी रेखा से थोड़ा ही ऊपर जीवन-यापन कर रहे हैं, जो अपने आर्थिक जीवन में सुधार के हकदार हैं।
सभी भारतीयों के जीवन में समृद्धि लाने के क्रम में मैं दो आधारों पर उम्मीदवारों का चयन करूंगा। इसमें पहला आधार क्रियान्वयन की क्षमता है। किसी काम को करने की क्षमता को मैं किसी विचार को हासिल करने से बेहतर मानता हूं। वादा तो कोई भी कर सकता है, लेकिन यथार्थ के धरातल पर उसे कुछ लोग ही उतार सकते हैं। मैं उस उम्मीदवार को वोट दूंगा जो विचार और क्त्रियान्वयन के बीच के अंतर को पाट सके। मेरा दूसरा आधार भारत के सीमित अवसरों से जुड़ा हुआ है, जो महज दस वषरें में खत्म हो जाएंगे। इस अवसर का आधार है जनसंख्या लाभ की स्थिति। यह एक तथ्य है कि भारत ऐसा युवा देश है जहां की अधिसंख्य आबादी कामगार वर्ग में शामिल है। जनसंख्या के लिहाज से जैसी हमारी स्थिति है वह हमें आर्थिक लाभ की स्थिति प्रदान करती है, क्योंकि उत्पादक वर्ग के लोगों की संख्या अधिक है जो गैर उत्पादक वर्ग को सहयोग देने की स्थिति में हैं। विश्व बैंक के मुताबिक लाभ की यह स्थिति प्रति वर्ष प्रति व्यक्ति जीडीपी विकास में दो फीसद का अतिरिक्त योगदान देती है। पूर्व-पश्चिम के सर्वाधिक सफल देश जनसंख्यात्मक लाभ से भलीभांति अवगत हैं। हाल के वषरें में चीन को भी यह उपलब्धि मिली है। मैं उसे वोट दूंगा जो जनसंख्यात्मक लाभ की शक्ति को समझेगा और उसके अनुरूप एजेंडा तय करेगा। इसके लिए बुनियादी ढांचे में निवेश करना होगा, कौशल प्रशिक्षण देना होगा और गैर उत्पादक सब्सिडी में कटौती करनी होगी। उद्यमियों के लिए निवेश का माहौल बनाना होगा, जिससे बड़ी तादाद में नए रोजगार पैदा होंगे।
गरीबों को सब्सिडी की नीति के बजाय इस तरह के कदमों से दीर्घकालिक समृद्धि आएगी। जब लोगों को रोजगार मिलेगा तो वह अधिक उपभोग करेंगे, जिससे उद्योगों को ताकत मिलेगी। इससे वह अधिक बचत कर सकेंगे, जिससे हमारे देश की पूंजी में इजाफा होगा। इसका असर आगे चलकर अधिक निवेश और विकास में झलकेगा। अभिभावक और कर्मचारी अपने बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर अधिक खर्च करेंगे, जिससे भविष्य में हमें अधिक उत्पादक श्रमशक्ति हासिल होगी। अधिक उत्पादन से महंगाई भी नीचे आएगी। उच्च आय और कम सब्सिडी से देश की राजकोषीय स्थिति मजबूत होगी और सरकार तब शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीबों के कल्याण के लिए अधिक काम कर सकेगी। जाहिर है हमें देखना होगा कि प्रतिस्पर्धी दलों में इसके लिए कौन अधिक बेहतर है। इसके लिए क्षेत्रीय पार्टियां उपयुक्त नहीं, क्योंकि वे मुख्यतया क्षेत्रीय मुद्दों पर केंद्रित होती हैं। वे धर्म व जाति के कार्ड खेलने में महारत रखती हैं, लेकिन आर्थिक विकास पर शायद ही बोलती हैं। आम आदमी पार्टी की मुख्य चिंता भ्रष्टाचार और क्रोनी कैपिटलिज्म है, न कि निवेश और नौकरियों का सृजन। क्षेत्रीय दलों और उनके नेताओं को वोट देना अपने मत को बेकार करना होगा, जैसे कि सपा के मुलायम सिंह, बसपा की मायावती और यहां तक आप के केजरीवाल को भी। दो राष्ट्रीय दलों में कांग्रेस के भीतर बैठे सुधारवादी जनसंख्यात्मक लाभ की शक्ति को अच्छी तरह समझते हैं, लेकिन वे कुछ कर पाने में असमर्थ हैं, क्योंकि सत्ताधारी वंश विकास का बहुत इच्छुक नहीं।
सोनिया और राहुल गांधी गरीबों को तत्काल कुछ दिए जाने के पक्ष में हैं, बजाय इसके कि नौकरियों और रोजगार के माध्यम से सतत चलने वाली विकास प्रक्त्रिया का इंतजार करें। उनकी प्राथमिकता सड़कें और ऊर्जा संयंत्र नहीं, बल्कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये खाद्यान्न वितरण, बिजली सब्सिडी और गैस सिलेंडरों में रियायत, मनरेगा तथा दूसरी कल्याणकारी योजनाएं हैं। इस नीति की वजह अधिकाधिक वोट पाने की मंशा है, लेकिन इससे विकास दर गिरती है, महंगाई बढ़ती है और दूसरी तमाम समस्याएं पैदा होती हैं। विकास और समानता की गलत नीति के कारण संप्रग सरकार ने सुधारों को रोक दिया और बुनियादी ढांचे पर ध्यान नहीं दिया। इससे निवेशकों का भरोसा भी टूटा। परिणामस्वरूप भारत की विकास दर नौ फीसद से गिरकर 4.5 फीसद पर पहुंच गई। इस वजह से मैं नहीं मानता कि कांग्रेस पार्टी जनसंख्यात्मक लाभ को समझने में समर्थ है। कांग्रेस संप्रग सरकार के काल में रुकी पड़ीं 750 बड़ी परियोजनाओं को शुरू करा पाने में भी समर्थ नहीं, क्योंकि सरकार में ही सत्ता के दो केंद्र हैं और हमारी नौकरशाही भ्रमित है। इसी का परिणाम अप्रत्याशित भ्रष्टाचार और अन्य नीतिगत अपंगताएं हैं। पिछले दस वषरें को देखें तो भाजपा ने भी रचनात्मक विपक्ष की भूमिका नहीं निभाई। इसने कांग्रेस के विकास विरोधी रवैये का सही तरह विरोध नहीं किया, लेकिन पिछले वर्ष से नरेंद्र मोदी के कारण उसकी सोच में जबरदस्त बदलाव आया है। उन्होंने विकास के एजेंडे के तहत निवेश, रोजगार, कौशल प्रशिक्षण और बुनियादी ढांचे पर ध्यान दिया। मोदी एक बेहतर प्रशासक और अच्छे क्त्रियान्यवनकर्ता हैं। वह विकास प्राथमिकताओं पर नजर रखते हैं, लाल और हरी फीताशाही को रोकते हैं और सेवा में सुधार के पक्षधर हैं। हालांकि केंद्र में गठबंधन के कारण उनके लिए यह सब आसान नहीं होगा, लेकिन उनमें समस्याओं पर जीत हासिल करने वाले एक राजनेता के सभी गुण हैं।
मोदी मेरे दोनों ही पैमानों पर खरे उतरते हैं। इसी कारण मैं भाजपा को वोट देना चाहता हूं। मैंने पहले कभी भाजपा को वोट नहीं दिया, क्योंकि उसकी राजनीति बहुसंख्यकवादी और हिंदुत्व के एजेंडे पर आधारित थी। यदि लालकृष्ण आडवाणी या पुराने लोग इसका नेतृत्व करते हैं तो भी मैं इसे वोट नहीं दूंगा, क्योंकि उनकी आर्थिक सोच भ्रमित है। मैं मोदी की एकाधिकारवादी और गैर-सेक्युलर प्रवृत्तिसे चिंतित हूं, लेकिन कोई भी अन्य पूर्ण योग्य नहीं है। मुझे विश्वास है कि अगले पांच वषरें तक 2002 जैसा कुछ नहीं होगा। मैं मोदी को वोट देने का जोखिम लेना पसंद करूंगा, क्योंकि मैं जनसंख्यात्मक लाभ को खोना नहीं चाहता। एक गरीब देश में रोजगार सृजन पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। जीडीपी में एक फीसद विकास से 15 लाख रोजगार पैदा होते हैं और प्रत्येक रोजगार से अप्रत्यक्ष तौर पर तीन लोगों को रोजगार मिलता है और प्रत्येक रोजगार से पांच लोगों की आजीविका चलती है।

Sunday, April 06, 2014

Secularism or growth? The choice is yours

This month’s national election may well be the most important in India’s history. Our country faces a limited window of oppor tunity called the ‘demographic dividend’ and if we elect the right candidate, prosperity will enter crores of lives. And in the course of time, India will become a middle class country. If we elect the wrong candidate, India will experience a ‘demographic disaster’ and the great hope of youth will turn into despair.
India’s opportunity comes from being unique ly young — the large majority of people are of working age. Such a demographic situation gener ally brings a surge in economic growth as gains to society from those in the productive age far outweigh the burden of supporting the old and the very young. The dividend typically adds two percentage points to per capita GDP growth per year, as many economically successful countries have demonstrated in the past.
We should vote for the candidate who has the ability to harvest the demographic dividend. He will achieve it by investing in infrastructure and skills training; cut red tape to encourage private investment; and eliminate unproductive subsi dies. This will create masses of new jobs. People in those jobs will consume more, which will give impetus to consumer industries. They will also save more, which will drive investment and growth. With more production, inflation will gradually decline. Falling fertility in the demo graphic transition will improve women’s health which will add to the workforce and improve social indicators. Higher income and lower sub sidies will improve government’s finances, mak ing it possible to invest more in education, health and welfare of the poor.
Who among the rival parties is best capable of delivering the demographic dividend? Certainly not the regional parties — they are mainly obsessed with local issues. The Aam Aadmi Party is con cerned with corruption and crony capitalism and has shown little interest in attracting investment or creating jobs. Between the two national parties the Congress is ambivalent. Its reformers under stand the power of the demographic dividend but they are usually trumped by a ruling dynasty that favours equity over growth, preferring give-aways to win votes from the poor. Although Congress new manifesto does speak of jobs and growth, it is a half-hearted attempt. Because of this ambiva lence, reforms and infrastructure building slowed in the UPA government, confusing investors and paralyzing the bureaucracy. And this led to a trag ic fall in India’s growth and rise in inflation.
That leaves the BJP. As an opposition, it has been a disaster. However, the BJP’s thinking in the past year has been dramatically transformed by Narendra Modi who is single-mindedly focused on investment, jobs, skills and growth — key ingredients in realizing a demographic dividend Modi has proven to be a consummate implement er, a rare skill among India’s politicians. His suc cess lies in giving clear direction to the bureauc racy, which could help him un-gum the system at the centre. Given clarity of purpose, the Indian bureaucracy is capable of high performance, as we saw in Narasimha Rao’s first two years from 1991 to 1993. For these reasons, he is our best chance to deliver the demographic dividend.
Modi is likely to reduce corruption as well based on his record. Those who think he will fail to manage a coalition do not give him credit for being a shrewd politician who has recently wrest ed leadership of his party. The BJP without Modi is an unappealing option; nor is voting for him vote for RSS’ social agenda. The RSS is afraid in fact, that its Hindutva programme might be marginalized by his economic agenda. But there is a clear risk in voting for Modi — he is polariz ing, sectarian and authoritarian. There is a great er risk, however, in not voting for him. It is to not create jobs for 8-10 million youth that enter the market each year. One per cent rise in GDP rough ly adds 15 lakh direct jobs; each job creates three indirect jobs, and each job supports five people This means three crore people are impacted by one per cent growth. Restoring growth to 8% is prize worth thinking about when casting one’ vote. There will always be a trade-off in values at the ballot box and those who place secularism above demographic dividend are wrong and elitist.

Thursday, March 06, 2014

Elect to transform India with these eight big ideas

The world is divided between optimists and pessimists. Optimists believe that if the government invests in infrastructure, removes barriers facing entrepreneurs, jobs will multiply, the economy will grow, and the country will gradually turn middle class. Pessimists worry about problems— inequality, crony capitalism, degrading environment, etc. The problems are real but optimists focus on opportunities and lead nations to success. Let’s hope an optimist is elected in 2014 after a decade of UPA’s pessimism, and here are eight big ideas to help him/her restore India to health.

First, bring urgency to growth, rubbishing the false trade-off between growth and equity, which is the destructive legacy of the Left under UPA-I and of the national advisory council under UPA-II. To this end, give priority to investment in power and roads. Second, eliminate the nearly 70 clearances (yes 70, according to planning commission’s new manufacturing policy!) for starting a business, and fuse them into a 'single window clearance' achieved by our competitor nations. India’s notorious red tape is mainly responsible for our 134th rank in World Bank’s ‘Doing Business’ report. Every country protects its environment but none stops hundreds of projects in the process.

Third, complete the good work already done to make the Goods and Services Tax (GST) a reality and India a national market. GST will replace the present nightmare of indirect taxes—state sales taxes, central sales tax, excise duty, service tax, entry tax, etc. Since it will tax only the added value at each stage, it will discourage cash transactions as no one wants to lose credit for taxes already paid. Compliance will rise, tax revenues will swell, black market will diminish, and peoples’ morals will improve.

Fourth, create masses of formal jobs by reforming senseless labour laws while creating a labour welfare fund (with contributions from employers and government) to finance transitory unemployment and re-training. Companies have to survive in a downturn. When orders decline, either one cuts workers or goes bankrupt. Successful nations allow employers to ‘hire and fire’ but protect the laid off with a safety net. India’s labour laws insist on lifetime jobs. Hence, Indian companies avoid hiring ‘permanents’ and 90% workers have ended up as ‘informals’ without a safety net. Protect workers, not jobs.

More than half our people are stuck in agriculture and the fifth imperative is to create a second green revolution. To this end: A) Scrap ‘agricultural produce marketing committees’ (APMC) which function as wholesaler cartels in mandis. Opening markets will allow traders and farmers to buy and sell freely, making India into a national market. When large retailers buy from farmers, they will save food from rotting through cold-chains, raising returns to farmers and lowering prices to consumers. B) Discard the minimum support price system, which has created massive distortions—growing rice in water scarce Punjab!— and destroyed the entrepreneurial dynamism of the Indian farmer. C) Reverse UPA government’s damaging decision against genetically modified crops. Recall, Bt cotton doubled India’s cotton production in five years and made us the world’s largest exporter. D) Have a predictable export-import regime for farm products. Stop the present ‘switch on, switch off’ policy which harms the farmer and brings disrepute to India. E) Remove the irrational conditions that are preventing global retailers from entering India. And BJP must get over its unreasonable opposition to FDI in retail. In those states where FDI in retail is banned, consumers will lose the opportunity for lower prices, farmers will lose prospect of higher returns, a third to half of fresh produce will continue to rot, and millions of unemployed youth will be denied jobs and careers in the modern retail economy.

Sixth, sell off hotels, airlines, and all uncompetitive public sector enterprises, including banks, which have been bleeding the country for generations. Especially, break the monopoly of Coal India, which has made India--sitting on the world’s third largest reserves--the largest coal importer in the world. Seventh, abolish all subsidies and replace them by cash transfers into the bank account of the female head of the household via mobile banking. NREGA, PDS, Food Corporation and all such leaky institutions must be phased out. As large sums are involved, employ the world’s best practices to determine who is a deserving beneficiary. Finally, get rid of license raj in education to meet the insatiable demand for good schools.

This is a big agenda but it is achievable by an optimist leader, who is also competent in execution. Such a leader will not only declare this policy agenda but will monitor progress, get into the messy details of execution, not to micro-manage but to encourage the implementers of the policy, and clear barriers. He will thus give the those who have to execute the policies—the bureaucracy--a sense of purpose and this will propel India to high growth, a demographic dividend, and to achieve its potential.

Sunday Times of India, March 2, 2014

Thursday, February 27, 2014

अमर प्रेम के भ्रम से उपजी त्रासदी

पिछले एक माह में रिश्तों में पैदा हुई त्रासदी से कई महत्वपूर्ण लोगों की जिंदगी में विनाश आया है। अच्छे लेखक और यूपीए सरकार में मंत्री शशि थरूर की पत्नी की दिल्ली में मौत हुई। कहा गया कि यह आत्महत्या थी। लगभग इसी समय फ्रांस की प्रथम महिला वैलेरी ट्रिरवेइलर को भी पेरिस के अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। ये दोनों घटनाएं संदिग्ध विवाहेत्तर रिश्तों के उजागर होने के बाद हुई। सुनंदा पुष्कर ने अपने पति पर एक पाकिस्तानी पत्रकार के साथ अंतरंग संबंधों का आरोप लगाया। ट्रिरवेइलर की जिंदगी फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वां ओलांड के एक अभिनेत्री से संबंधों के कारण उजड़ गई। प्रकरण उजागर होने के कुछ दिनों बाद दोनों अलग हो गए। ये ग्लैमरस सेलिब्रिटीज के बारे में कोई उथले सैक्स स्कैंडल नहीं थे। ये मानव परिस्थिति के बारे में कुछ गहरी और दुखद बातें उजागर करते हैं।
ऐसे प्रकरणों में आमतौर पर वफादारी न निभाने वाले पुरुष को दोष दिया जाता है। उसे झूठा, विश्वासघाती और धोखेबाज कहा जाता है। फिर ऐसे लोग भी होते हैं जो प्रेम विवाह की प्रथा को भी उतना ही दोषी मानते हैं। आधुनिक प्रेम विवाह में तीन पहलू होते हैं-प्रेम, अंतरंग संबंध और परिवार। इनके कारण संबंधित युगल से प्राय: असंभव-सी अपेक्षाएं की जाती हैं। बेशक विवाह के पीछे मूल विचार तो परिवार का निर्माण ही था। फिर इसके साथ रोमांटिक प्रेम आ गया और यह मांग भी जुड़ गई कि जीवनसाथी अंतरंग रिश्तों में भी परिपूर्ण साबित हो।
दार्शनिक एलन डि बोटोन के मुताबिक पुराने समय में पुरुष इन तीन जरूरतों को तीन भिन्न महिलाओं के जरिये पूर्ण करते थे। पत्नी घर का निर्माण करती थी, बच्चों की देखभाल करती थी। एक प्रेमिका चोरी-छिपे उसकी रोमांटिक जरूरतें पूरी करती थी और अन्य प्रकार के संबंध के लिए कोई बाहरी औरत होती थी। भूमिकाओं का यह विभाजन पुरुषों के बहुत अनुकूल था, किंतु आज हम एक ही व्यक्ति से तीनों भूमिकाएं निभाने की नामुमकिन-सी अपेक्षा रखते हैं। ऐसे में खासतौर पर मध्यवर्गीय कामकाजी महिलाएं इन अपेक्षाओं को लेकर बहुत दबाव महसूस करती हैं। फिर घर के बाहर कॅरिअर में सफल होने का तनाव तो होता ही है। ऐसे में वे सिर्फ एक प्रेमपूर्ण, उदार और वफादार पति चाहती हैं।
आधुनिक प्रेम विवाह की इतनी सारी जरूरतें पूरी करने की पागलपनभरी आकांक्षाएं बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक बोझ हो जाता है। इससे शायद सुनंदा पुष्कर और ट्रिरवेइलर की त्रासदियों को समझने में मदद मिल सके। मेरे दो पसंदीदा उपन्यास फ्रांसीसी लेखक गुस्ताव फ्लाउबर्त का मेडम बोवेरी और लियो तोल्सतोय का एना कैरेनिना की नायिकाओं की त्रासदी के पीछे भी निश्चित ही ये ही कारण थे। दोनों महिलाओं को ऐसी आर्थिक सुरक्षा प्राप्त थी, जिससे किसी को भी रश्क हो सकता था पर उनके विवाह में प्रेम नहीं था। दोनों को जीवन से रोमांस की आधुनिक अपेक्षाएं थीं और उन्होंने विवाहेत्तर संबंधों में इसे पाने का दुस्साहस किया। हालांकि समाज उनके इन संबंधों के प्रति उदार नहीं था और दिल टूटने से उनकी जिंदगियां आत्महत्या में खत्म हुईं।
मौजूदा भारत में लोगों के जीवन में रोमांटिक प्रेम का परिचय कराने में बॉलीवुड की मुख्य भूमिका रही। फिल्मों के प्रभाव के बावजूद भारतीयों को यह रोमांटिक प्रेम का मिथक कभी पूरी तरह स्वीकार नहीं हुआ। इसीलिए अरेंज मैरिज की समझबूझभरी संस्था न सिर्फ कायम है बल्कि फल-फूल रही है। संपूर्ण मानव इतिहास में ज्यादातर समाजों में अरेंज मैरिज की ही प्रथा रही है, किंतु 19वीं सदी की शुरुआत में पश्चिम में मध्यवर्ग के उदय के साथ लव मैरिज चलन में आया। यह उसी दौर की बात है जब यूरोप में वैचारिक जागरूकता आई, जिसमें स्वतंत्रता, समानता, व्यक्तिवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे विचार हावी थे। लव मैरिज के साथ ये उदार मूल्य ब्रिटिश राज के साथ भारत में आए। आज ये मूल्य बहुत बड़े पैमाने पर मध्यवर्ग में जगह बना चुके हैं।
चाहे आधुनिक प्रेम विवाह भारत में पश्चिम से आया पर रोमांटिक प्रेम हमारे लिए नया नहीं है। संस्कृत और पाली प्रेम काव्य में हमें इसके दर्शन होते हैं। विद्याकार के खंडकाव्य और सतसई तो इसके उदाहरण हैं ही, कालीदास जैसे शास्त्रीय कवि और बाद में भक्ति काव्य खासतौर पर गीत गोविंद में यह दिखाई देता है। इस काव्य में लगातार निषिद्ध रोमांटिक प्रेम की चर्चा है। ऐसे निषिद्ध प्रेम के मोह से कौन बच सका है। एक सुंदर अजनबी के साथ प्रेम संबंध एक रोमांचक संभावना है खासतौर पर बरसों तक बच्चों की परवरिश के थकाऊ अनुभव के बाद तो इसका आकर्षण बढ़ ही जाता है। सिर्फ शारीरिक सुख ही इस ओर नहीं खींचता पर खुद के अहंकार के पूजे जाने का गर्व भी इसकी वजह होती है।
हालांकि इन आह्लादकारी विचारों पर अपने जीवनसाथी को चोट पहुंचाने का अपराध बोध मंडराता रहता है। विवाहेत्तर संबंधों में हमेशा कोई न कोई तो शिकार होता ही है। भारतीय पुरुष के लिए यह जीवन के दो लक्ष्यों, धर्म यानी नैतिकता और काम के बीच संघर्ष का भी होता है।  देह के आनंद का उत्सव मनाने वाले कामसूत्र में भी कहा गया है कि काम की आवेगात्मक इच्छाओं की लगाम धर्म के हाथों में होनी चाहिए।
इसके कारण एक धर्मसंकट पैदा होता है। एक व्यक्ति दूसरे को धोखा दे या खुद को। दोनों में से कोई भी विकल्प आजमाए, उसकी हार ही है। यदि आवेग को प्राथमिकता दी तो जीवनसाथी के साथ धोखा होता है और प्रेम जोखिम में पड़ जाता है। यदि प्रलोभन के प्रति उदासीन हो जाए तो खुद के दमित होने का जोखिम रहता है। यदि प्रेम प्रकरण गुप्त रखता है तो वह व्यक्ति भरोसे के काबिल नहीं रहता। स्वीकार करता है तो बेवजह का दुख पैदा हो जाता है। यदि खुद की बजाय बच्चों के हित को तरजीह देता है तो बच्चों के चले जाने के बाद असंतोष पैदा होता है। खुद के हित को तरजीह देता है तो बच्चों की कभी खत्म न होने वाली नाराजी का सामना करना पड़ता है। खेद है कि यह दुखद और नैराश्यपूर्ण स्थिति 'काम' के कारण पैदा होती है, कम से कम पुरुषों के दृष्टिकोण से तो यही बात है।
पिछले कुछ दशकों से भारत में विवाह को लेकर रवैया बदल रहा है और युवा अब दैहिक संबंधों पर स्वतंत्रतापूर्वक चर्चा करते हैं। अरेंज मैरिज के बने रहने के बावजूद युवावर्ग उसके प्रेम में पडऩा चाहता है, जिससे उसे विवाह करना होता है। जब उनके विवाह में कोई गड़बड़ होती है तो उनका रोमांटिक भ्रम छिन्न-भिन्न हो जाता है। फिर देवदास की तरह वे टूटे दिल की तीमारदारी में लग जाते हैं। वे यह नहीं समझते कि कभी न खत्म होने वाला प्रेम बॉलीवुड और रोमांटिक काव्य की देन है। उन्हें अहसास नहीं है कि मानवीय प्रेम हमेशा खत्म होता है। हम अकेले पैदा होते हैं, अकेले मरते हैं। इन दो घटनाओं के बीच हमें जो भी साथ मिलता है वह विशुद्ध रूप से किस्मत की बात है। अकेलापन यह हमारी सामान्य मानवीय परिस्थिति है। हमें संकल्प के साथ अपने इस अकेलेपन को एक परिपक्व, परवाह करने वाले और स्वतंत्र व्यक्तित्व में बदलना चाहिए। एक-दूसरे के व्यक्तित्वों और पृथकता की सच्ची स्वीकार्यता ही वह नींव है जिस पर एक परिपक्व विवाह आधारित होना चाहिए।

Sunday, February 02, 2014

Modern marriages aren’t made in heaven

In the past few weeks, sexual tragedies have blighted some prominent and attractive lives. Sunanda Pushkar, wife of the writer and minister, Shashi Tharoor, died recently in Delhi. Around the same time, the French First Lady, Valerie Treirweiler, had to be hospitalized in Paris. Both events followed revelations of alleged sexual affairs. Sunanda Pushkar accused her husband of an intimate relationship with a Pakistani journalist. Ms Treirweiler was devastated by the French president, Francois Hollande’s liaison with an actress; France’s first family split a few days later. These are not only titillating sex scandals about glamorous celebrities — they reveal something deeper and infinitely sad about the melancholic human condition. 

The standard narrative in such cases is to blame the unfaithful man, calling him 'scumbag’ and 'cheat'. There is another narrative, however, which holds the institution of 'love marriage' equally guilty. Modern marriage combines three idealistic ideas — love, sex, and family — which make distinctive but unreasonable demands on a couple. To raise a family was, of course, the original idea behind marriage. To it has been added the second ideal of romantic love; and a third — that one's partner should also be a great performer in bed. 

We have a sensible institution in India called 'arranged marriage' which we contrast with 'love marriage'. Throughout human history arranged marriages were the norm in most societies. People got married to raise a family. In early 19th century, with the rise of the middle-classes, 'love marriage' emerged in Europe. It coincided with the Enlightenment, which incubated 'modern' ideas such as liberty, equality, individualism and secularism that quickly swept the world. These liberal ideas, along with 'love marriage', came to India on the coat tails of the British Raj. Initially it infected a tiny westernized minority but today it has permeated a larger middle-class. Most Indians received their ideal of 'love marriage' unreliably from Bollywood, which may explain why good old fashioned arranged marriage is still well and alive in India. 

In pre-modern times, men satisfied the three needs via three different individuals, according to the philosopher Alain de Botton's sensitively male perspective. A wife made a home and children; a lover fulfilled one's romantic needs clandestinely ; and an accomplished prostitute or courtesan was always there for great sex. This division of labour served men well. Given a chance, I expect, my grandfather would have lived thus. But today, we make impossible demands on a single person to meet romantic, sexual and familial needs. She feels huge pressure to fulfil all three roles plus make a career outside the home. What she mostly wants is a love marriage with good and faithful husband. 

The insane ambition of modern love marriage to satisfy so many needs places a huge burden and this might also help to explain the tragedies of Sunanda Pushkar and Valerie Treirweiler. It was certainly behind the tragedies that befell the heroines of two of my favourite novels, Madame Bovary and Anna Karenina. Both women had enviable financial security but also loveless marriages. But both had modern, romantic expectations from life, and dared to fulfil them outside marriage. Society did not forgive their illicit love affairs and their lives ended in tragic suicides. 

Human beings may have become modern and liberal but society remains conservative. Who has not been tempted by illicit love? An affair with a beautiful stranger is a thrilling prospect, especially after years of raising children. There is also fear of death if one is middle-aged — life is passing and when will another chance come? But these exhilarating thoughts have to be weighed against hurting another human being. One must always empathize with the victim of adultery. Even the Kamasutra admits that dharma trumps kama. 

Does one betray another human being or oneself ? Either way one loses. If one decides to have a fling, one betrays a spouse and puts one's love at risk. If one abstains from temptation, one risks becoming stale and repressed. If one keeps the affair secret, one becomes inauthentic. Confessing to it brings needless pain. If one places one's children's interest above one's own, one is disappointed when they leave. If one puts one's own interest above theirs, one earns their unending resentment. This, alas, is the unhappy, melancholic human condition.

Sunday, January 26, 2014

Aam Aadmi is not the reforming party India needs, Financial Times,January 26, 2014

The leadership is trapped in the ideas of the old left, writes Gurcharan Das

For the past six weeks Indians have been mesmerised by the stunning success of the Aam Aadmi party, which has propelled its 45-year-old activist leader, Arvind Kejriwal, to chief minister of Delhi. The AAP – or Common Man party – is only a year old but its popularity is challenging the supremacy of India’s two main political parties, the left-leaning Congress and the Hindu nationalist Bharatiya Janata party.
Yet despite its many commendable features, the AAP is not the party needed to revive investment and growth and unlock India’s potential. Mr Kejriwal’s gentle, charming rhetoric seems to hide illiberal instincts. His party, furthermore, could prevent the formation of a stable government in this year’s national elections if it diverts enough votes from Narendra Modi of the Bharatiya Janata party, the leading contender.

The AAP has rapidly given many Indians a wonderful sense of nationhood. Its transparent fundraising contrasts with the murky electoral financing of other parties. Its strident rhetoric has forced parliament to enact anti-corruption legislation that had been languishing for years. Its politicians’ frugality has embarrassed those of other parties who live in sprawling bungalows with gun-toting security brigades.

A young, aspiring middle class, sick of corruption, is largely driving the AAP phenomenon. Filled with hope and ambition, it wants jobs, opportunities and a better life for its children. But the party’s leadership is trapped in the ideas of the old left and could take India back to its socialist past, the pre-1991 days when it was a perpetual underachiever. Since the leadership is out of sync with the aspirations of its followers, the party may yet hit a wall and run out of steam. It is a fate that has been met by many populist movements before.

The AAP failed its first economics test this month when it disallowed foreign investment in Delhi supermarkets. It did not realise that its supporters would prefer to work in modern supermarkets rather than dingy localkirana stores. It forgot that, the world over, the “common man” shops in supermarkets where prices are lower because large retailers shun intermediaries to buy their produce directly from farmers, passing on the savings to consumers.

Instead of fighting supermarkets, the AAP should have scrapped a law that forces farmers to sell through
official “agricultural produce marketing committees” – in effect, wholesaler cartels. This would benefit consumers, curbing rises in fruit and vegetable prices. It would also, for example, allow supermarkets to buy directly from farmers, keep the produce fresh throughout the supply chain and save food from rotting in the field.

The man in charge of running one of India’s leading cities has the opportunity to transform it into an innovative services hub, and to lift his supporters to the affluence enjoyed in the Asian tiger economies. But Mr Kejriwal does not realise that, since the arrival of the metro over a decade ago, Delhi has changed from an old bureaucratic town of constipated civil servants to become a lively commercial city.

His first move was to give all households 20,000 litres of free water a month – a populist ploy that will not help the poorest 30 per cent of Delhi citizens who are without running water. This middle-class subsidy will lead to meter-tampering and destroy the finances of the publicly owned water authority, leaving scant funds for maintenance, or for laying new pipes in poor neighbourhoods.

What makes Mr Kejriwal unique is his obsession with corruption. But to tackle it he will have to go beyond his favourite idea, the Lokpal, an independent anti-corruption agency with the power to expose wrongdoing by officials. At a minimum, he must eliminate opportunities for official malfeasance by reforming the bureaucracy and the judiciary. He has shown little inclination for this hard work.

Indian voters, unfortunately, do not have a choice when it comes to economic issues. Every party is left of centre; hence, reforms take place by stealth.

The space at the right of centre remains empty. More than the AAP, India needs a liberal party that openly trusts markets and focuses on economic and institutional reform. But this situation might soon change. Mr Modi is openly right of centre. Even though his own party is confused on economic issues, his state of Gujarat has registered double-digit economic growth for more than a decade through his ability to attract private investment. He may not be the liberal reformer India needs but he is decisive, business friendly and gets things done.

No party seems capable of winning a majority in the forthcoming elections, and voters are reconciled to another coalition. The AAP’s role might well be that of a spoiler, which will mean instability in a country where decision making has been paralysed for the past five years under Congress party rule.

The writer is the author of ‘India Grows at Night: A Liberal Case for a Strong State’


Saturday, January 25, 2014

आप से ज्यादा उम्मीद नहीं

आम आदमी पार्टी को दिल्ली चुनावों में मिली सफलता से तमाम भारतीय नागरिक मंत्रमुग्ध हैं। आम आदमी पार्टी का नेतृत्व 45 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल के हाथों में है, जो फिलहाल दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं। यह पार्टी महज एक साल पुरानी है, लेकिन इसकी अपार लोकप्रियता भारत के दो प्रमुख राजनीतिक दलों-वाम नीतियों के प्रति झुकाव रखने वाली कांग्रेस और हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी की सर्वोच्चता को चुनौती पेश कर रही है। अपनी तमाम प्रशंसनीय विशेषताओं के बावजूद आप वह पार्टी नहीं है जो अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर ला सके अथवा रोजगार और विकास के संदर्भ में भारत की क्षमताओं को बढ़ा सके। वास्तव में यदि आप आगामी चुनावों में पर्याप्त सीटें जीतती है तो यह प्रमुख प्रतिद्वंद्वी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक स्थिर सरकार की संभावना को अस्थिर कर सकती है।
बहुत कम समय में आप ने तमाम भारतीय नागरिकों को राष्ट्रीयता के संदर्भ में एक नया और चमत्कारिक नजरिया दिया है। आप ने जिस पारदर्शी तरीके से चुनावी चंदा इकट्ठा किया वह दूसरी तमाम पार्टियों के लिए शर्म का विषय होनी चाहिए। इस पार्टी ने भ्रष्टाचार के मसले पर जिस तरह का कड़ा रुख अख्तियार किया उसने संसद को भ्रष्टाचार रोधी कानून लोकपाल को पारित करने के लिए विवश किया। इस पार्टी के सादगी भरे आचरण ने बड़े बंगलों में रहने वाले और भारी सुरक्षा का तामझाम रखने वाली दूसरी पार्टियों के नेताओं को शर्मिदा होने के लिए विवश किया। युवाओं और मध्य वर्ग की आकांक्षाओं तथा भ्रष्टाचार की महामारी जैसे कारक इसकी चमत्कारिक सफलता के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं।
इस संदर्भ में यह भी एक तथ्य है कि नई उम्मीद और आकांक्षाओं से भरा हुआ यह वर्ग रोजगार के नए अवसर तथा अपने बच्चों के लिए एक बेहतर जीवन की उम्मीद रखता है, लेकिन दुर्भाग्य से आम आदमी पार्टी का नेतृत्व भारत के पुराने वामपंथी विचारों में जकड़ा हुआ है। यह भारत को 1991 से पूर्व के उस समाजवादी अतीत में ढकेल सकता है, जब हमारा देश कोई खास प्रगति नहीं कर सका था। यदि आप नेतृत्व अपने समर्थकों की आकांक्षाओं को नहीं समझता है तो पार्टी को बहुत जल्द नुकसान पहुंच सकता है और तमाम अन्य लोकप्रिय आंदोलनों की तरह यह भी अपनी लोकप्रियता खो सकती है।
विगत सप्ताह में आप अपने पहले आर्थिक इम्तिहान में फेल साबित हुई। इसने एक गलत धारणा के आधार पर सुपरबाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को इसलिए अनुमति देने से इन्कार कर दिया कि इससे सुपरबाजार में नौकरियां खत्म होंगी। वह इस बात को नहीं समझ सकी कि इसके समर्थक किसी गंदे किराना स्टोर में काम करने की बजाय एक आधुनिक सुपरबाजार में काम करना पसंद करेंगे। वह भूल गई कि विश्व में सभी जगह आम आदमी अथवा कॉमन मैन सुपरबाजार से सामान खरीदना पसंद करते हैं, क्योंकि यहां कीमतें अपेक्षाकृत कम होती हैं। यहां कीमतें इसलिए कम होती हैं, क्योंकि बड़े खुदरा व्यापारी किसानों से सीधे उत्पाद खरीदते हैं और बिचौलियों की भूमिका नहीं होने के कारण बचने वाला लाभ उपभोक्ताओं को मिलता है।
सुपरबाजार पर प्रहार करने की बजाय आप किसानों को अपना उत्पाद कृषि उत्पाद विपणन समितियों को बेचने के लिए विवश करने वाले कानून को खत्म करती ताकि फल और सब्जियों के दाम नीचे आते। थोक बाजार को खुला करने से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और व्यापारी किसानों से सीधे सामान खरीद सकेंगे, जिससे महंगाई घटेगी।
सभी घरों को 20 किलोलीटर नि:शुल्क पानी देने का विचार बेतुका है। इससे दिल्ली के 30 फीसद गरीबों को कोई मदद नहीं मिलेगी। सब्सिडी की नीति से गरीबों के घर तक पाइपलाइन बिछाने अथवा आधुनिक विकास कार्यो के लिए धन नहीं बचेगा। इसी तरह कैग द्वारा बिजली कंपनियों की ऑडिट से बिजली की आपूर्ति नहीं बढ़ने वाली, बल्कि इससे बिजली क्षेत्र में निवेश और हतोत्साहित होगा। असल में कंपनियों के खातों का ऑडिट पेशेवरों द्वारा होना चाहिए न कि राजनीतिक रूप से अभिप्रेरित सीएजी द्वारा, जो बिजनेस की बारीकियां नहीं समझता। 2002 में जब से दिल्ली की बिजली कंपनियों का निजीकरण हुआ था, बिजली के वितरण में नुकसान और बिजली चोरी 57 प्रतिशत से घटकर 17 प्रतिशत रह गई है। इस बीच जितनी लागत बढ़ी है उतने रेट नहीं बढ़े हैं। 2002 से बिजली की लागत 300 प्रतिशत बढ़ चुकी है जबकि बिजली दरों में मात्र 70 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। अगर केजरीवाल ऊर्जा वितरण में सुधार चाहते हैं तो उन्हें बिजली कंपनियों का एकाधिकार तोड़कर उनकी संख्या बढ़ानी चाहिए ताकि आपसी प्रतिस्पर्धा बढ़े। प्रतिस्पर्धा बढ़ने से कम दाम में बेहतर सेवा मिल सकेगी।
भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों का स्टिंग ऑपरेशन और दिल्ली विश्वविद्यालय में सीटें आरक्षित करने का विचार भी सही नहीं है। भ्रष्टाचार के प्रति कड़ा रुख केजरीवाल की असाधारण विशेषता है। किंतु इससे निबटने के लिए केजरीवाल का प्रमुख उपाय जनलोकपाल सही नहीं ठहराया जा सकता। इससे अधिकारियों की शक्ति घटेगी और प्रशासन, पुलिस व न्यायपालिका में जरूरी सुधार लागू नहीं हो पाएंगे।
दुर्भाग्य से आर्थिक मुद्दों पर भारतीय मतदाताओं के पास कोई विकल्प नहीं है। भाजपा के अलावा हर पार्टी का झुकाव वाम की तरफ है और वे खुद को समाजवादी कहलाने में गर्व महसूस करते हैं। दक्षिण की तरफ झुकाव का स्थान रिक्त है। आप के बजाय भारत को एक ऐसी उदारवादी पार्टी की जरूरत है जो अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए खुलकर बाजार पर भरोसा करे न कि नौकरशाही और राजनेताओं पर। ऐसी पार्टी को आर्थिक और संस्थागत सुधारों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। किंतु यह स्थिति जल्द ही बदल सकती है। प्रधानमंत्री पद के भाजपा के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी दक्षिण की ओर झुकाव वाले हैं और फिलहाल देश में सबसे अधिक लोकप्रिय भी हैं। यद्यपि उनकी खुद की पार्टी आर्थिक मुद्दों पर भ्रम का शिकार है, किंतु उनका राज्य गुजरात एक दशक से भी अधिक समय से दोहरे अंकों में आर्थिक विकास कर रहा है। इससे मोदी की निजी निवेश को आकर्षित करने की क्षमता का पता चलता है। वह एक उदारवादी सुधारक नहीं हैं, जिसकी भारत को सबसे अधिक आवश्यकता है, किंतु वह फैसले लेने वाले, व्यापार को बढ़ावा देने वाले और चीजों को दुरुस्त करने वाले व्यक्ति हैं।
आगामी चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलता नजर नहीं आ रहा है और भारतीय मतदाता किसी नए गठबंधन पर विचार कर रहा है। फिलहाल चुनावी दौड़ में मोदी सबसे आगे चल रहे हैं, किंतु बहुत से लोगों का मानना है कि आम आदमी पार्टी इतनी सीटें ले जा सकती है कि मोदी एक स्थिर सरकार का गठन न कर पाएं। इस प्रकार आगामी चुनाव में आप खेल बिगाड़ने की ऐतिहासिक भूमिका अदा कर सकती है। इसका सीधा अर्थ यह होगा कि देश में अस्थिरता छा जाएगी। पिछले पांच साल से कांग्रेस पार्टी की फैसले लेने की पंगुता जग-जाहिर है।