Saturday, September 13, 2014

मजबूत नेतृत्व का असर

आम जनता की अपेक्षाओं के लिहाज से मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल पर निगाह डाल रहे हैं गुरचरण दास
भारत के लोगों ने नरेंद्र मोदी का चुनाव बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन करने, बेहतर शासन देने और महंगाई पर लगाम लगाने के लिए किया। अभी यह कहना बहुत जल्दबाजी होगी कि वह इन तीनों ही वादों को पूरा कर सकेंगे। उनके कार्यकाल के शुरुआती तीन-साढ़े तीन माह यही दर्शाते हैं कि वह किस तरह इन लक्ष्यों को पूरा करना चाहते हैं। लोगों की अपेक्षाओं को देखते हुए सरकार को बहुत सजग रहना होगा। आज की तिथि तक मोदी का उल्लेखनीय योगदान यही है कि सरकार में सभी स्तरों पर कार्यो के निपटारे में चमत्कारिक सुधार आया है। कांग्रेस शिकायत कर रही है कि मोदी सरकार के पास नए विचारों का अभाव है और वह संप्रग सरकार के विचारों की नकल कर रही है। हालांकि सच्चाई यही है कि विचार किसी के भी पास हो सकते हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन कुछ लोग ही कर सकते हैं।
जो लोग मोदी सरकार द्वारा बड़े सुधार न किए जाने से निराश हैं वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि भारत की सबसे बड़ी समस्या विचारों, नीतियों और कानूनों का अभाव नहीं, बल्कि इनका खराब क्रियान्वयन है। क्रियान्वयन में कमजोरी ही वह मुख्य कारण जिससे भारत की विकास दर पिछले तीन वर्षो में गिरती गई। पहले दिन से ही मोदी ने अपेक्षाओं को काफी ऊंचा रखा। उन्होंने सुरक्षित रास्ते का अनुसरण करने से इन्कार किया और इस वर्ष के लिए राजकोषीय घाटे पर नियंत्रण पाने का ऊंचा लक्ष्य तय किया और कहा कि वह इसे हासिल कर सकते हैं। वह निर्धारित लक्ष्य हासिल कर पाएंगे, इसमें संदेह है, लेकिन उद्देश्य को लेकर एक नई सोच आई है तथा केंद्र समेत तमाम राज्यों और यहां तक कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के रुख में स्पष्ट बदलाव परिलक्षित होने लगा है। इसका प्रमाण प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप अथवा परियोजना निगरानी समूह के गठन से लगाया जा सकता है, जो सैकड़ों की संख्या में रुकी पड़ी परियोजनाओं के अवरोधों को हटाने का प्रयास करेगा। इससे केंद्रीय मंत्रालयों के अधिकारी, राज्य सरकारें और बिजनेस वर्ग भी काफी उत्साहित है। हालांकि इसका गठन पहले ही हो गया था, लेकिन इस समूह को ऊर्जा तब मिली जब मोदी सत्ता में आए। ऐसी रिपोर्ट हैं कि पिछली सरकार में जो अधिकारी परियोजनाओं को रोकने में बाधक बन रहे थे और उदासीन रवैया अपनाए हुए थे अब वही अधिकारी जोशपूर्वक इन्हें आगे बढ़ा रहे हैं और लंबित परियोजनाओं को स्वीकृति दे रहे हैं।
अब चुनौतियां और बाधाएं खत्म हो रही हैं। एक समय इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं वर्षो तक रुकी रहने के कारण उद्यमी दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गए थे और बैंकों को भी काफी नुकसान उठाना पड़ता था। स्थिति कुछ ऐसी थी कि पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी मिलने के बाद भी बैंक वित्तीय मदद देने से इन्कार कर देते थे। नए भूमि अधिग्रहण कानून ने भी तमाम मुश्किलों को खड़ा करने का काम किया। तमाम राज्यों ने जानकारी दी कि नया कानून अस्तित्व में आने के बाद सभी तरह की भूमि की खरीद-बिक्री का काम बुरी तरह प्रभावित हुआ है। जब आप सैकड़ों की संख्या में रुकी परियोजनाओं के संदर्भ में इस समस्या का आकलन करते हैं तो आप सोचने को विवश होंगे और संप्रग सरकार की घटिया विरासत को लेकर देश की दुर्दशा पर रोएंगे या दुखी होंगे। इस मामले में हमें एक नई सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार करने वाली मोदी सरकार को धन्यवाद देना चाहिए कि उसने हाथ खड़े करने के बजाय अधिकारियों को उत्तर खोजने के लिए प्रेरित किया और नतीजा यह हुआ कि सब कुछ चलता है की प्रवृत्ति वाले नौकरशाह अब उल्लेखनीय काम कर रहे हैं। मोदी द्वारा हाथ में ली गईं महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की दिशा में एकल खिड़की का प्रावधान बड़ा बदलाव लाने में सहायक होगा। भारत में कोई उद्योग शुरू करने के लिए तकरीबन 60 क्लीयरेंस लेने की जरूरत पड़ती है, इनमें से 25 केंद्र के स्तर पर और 35 राज्य स्तर पर होती हैं, लेकिन डिजिटलीकरण के बाद यह सारे काम एक ही परियोजना निगरानी समूह द्वारा संभव होंगे। पूर्ण डिजिटलीकरण के बाद उद्यमी इसके लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकेंगे और अपने काम की प्रगति की जानकारी इंटरनेट पर देख सकेंगे। इससे यह भी पता चलेगा कि कौन अधिकारी फाइलों को रोक रहा है। इस तरह उद्यमियों के लिए एकल खिड़की का सपना साकार हो सकेगा। तीव्र क्रियान्वयन से रोजगार सृजन भी तेज होगा। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में नियुक्तियों में 20 फीसद की बढ़ोतरी हुई है जो पिछले पांच वर्षो में बेहतरीन प्रदर्शन है।
मोदी भाग्यशाली रहे कि अप्रैल से जून तिमाही में जीडीपी विकास दर बेहतर रही। यह अर्थव्यवस्था में बढ़ोतरी और उच्च विकास को दर्शाती है। स्पष्ट है कि रोजगार का अधिक सृजन होगा। मोदी को तेज क्रियान्वयन के खतरे के प्रति भी सजग रहना होगा। जन-धन योजना एक बेहतरीन कार्यक्रम है, जिससे सभी भारतीयों को बैंक खाते की सुविधा मिलेगी और निर्धन वर्ग से संबंधित योजनाओं के लिए नकदी हस्तांतरण के माध्यम से बड़ी मात्रा में सरकारी धन की बचत होगी। हालांकि यह योजना बैंकों पर अत्यधिक निर्भर है, जो गरीबों का खाता खोलने के लिए बहुत इच्छुक नहीं हैं। बैंक तभी रुचि लेंगे जब सब्सिडी की वर्तमान व्यवस्था को खत्म किया जाए और धन का प्रवाह गरीबों के लिए खुले इन खातों में किया जाए। इसमें समय लगेगा।
जहां तक मोदी की ओर से शासन में सुधार, क्लीयरेंस में पारदर्शिता के माध्यम से जवाबदेही के वादे की बात है तो निश्चित रूप से इससे लालफीताशाही खत्म होगी। सिंगापुर, अमेरिका जैसे तमाम देशों में बिजनेस शुरू करने में 3 से 5 दिन लगता है, जबकि भारत में 75 से 90 दिन। इसी कारण बिजनेस रैंकिंग रिपोर्ट में भारत का स्थान 134वां है। तीसरा मुद्दा महंगाई पर नियंत्रण का है। मोदी सरकार अतिरिक्त पड़े भंडारों से खाद्यान्नों को बेच रही है जिससे इनके दाम गिरे हैं, लेकिन यदि आयात शुल्क घटाए जाते हैं और महत्वपूर्ण खाद्यान्नों व सब्जियों आदि पर से गैर टैरिफ बाधाओं को खत्म किया जाता है तो वह इस तीसरे लक्ष्य को भी हासिल कर सकेंगे। पेट्रोलियम पदार्थो के दाम कम हुए हैं और मानसून का बहुत खराब न रहना मोदी के लिए लाभदायक है। यदि वह सरकारी खर्चो में कटौती कर सके तो महंगाई और कम होगी। ध्यान रहे संप्रग सरकार में सरकारी खर्च महंगाई बढ़ने की एक मुख्य वजह थी।
मोदी कार्यकाल के तीन महीने बताते हैं कि कैसे एक प्रभावी नेतृत्व बेहतर क्रियान्वयन के माध्यम से सरकार की क्षमता को बढ़ा देता है। कम महंगाई के साथ उच्च विकास को बनाए रखने के लिए मोदी को दूसरी पीढ़ी के आर्थिक सुधारों पर अमल करना होगा। भ्रष्टाचार पर प्रहार करने और बेहतर शासन के लिए उन्हें नौकरशाही, पुलिस और न्यायपालिका में सुधार करना होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात, मोदी को केसरिया ब्रिगेड पर नियंत्रण करना होगा, जो उनके तीन वादों को पूरा करने में अनावश्यक अड़चन पैदा कर सकती है।

Sunday, September 07, 2014

Cautious optimism is the verdict on Modi’s 100 days

Indians elected Narendra Modi to create masses of jobs, give good governance, and control inflation. It is too soon to tell if he will keep his three promises. The first hundred days indicate how he intends to pursue these three objectives. The verdict so far leaves us cautiously optimistic.

Modi’s defining contribution to date is to dramatically improve execution at all levels of the government. The Congress carps about the lack of new ideas. But anyone can have ideas – only a few can implement them. Those frustrated by the lack of big-bang reforms do not realize that India’s great deficit is not ideas, policies, or laws but the poor execution of existing ones. Executional paralysis was one of the main reasons for India’s growth rate plummeting in the past three years.

From day one, Modi set high expectations. He refused to accept a safer, more achievable fiscal deficit target for this year, arguing that people perform to expectations. Whether he will achieve the target is doubtful but there is a new sense of purpose and a visible change in attitude at many levels in the government. Tangible evidence has emerged from the Cabinet Secretariat’s Project Monitoring Group, which is attempting to debottleneck hundreds of stalled projects. It is vigorously engaged with officials from central ministries, the states and businesses. It reports that the same officials who were obstructive or indifferent and blocked hundreds of projects in the last government are now upbeat, motivated and are clearing the massive backlog.

The challenge is daunting. When an infrastructure project has been stalled for years, the entrepreneur is generally bankrupt, having caused massive pain to the banks. Even if the environment ministry clears it now, the banks refuse to finance it. Add to this the impossible hurdle imposed by the new land acquisition law.Many states report that all land transactions have come to a halt since the new law was enacted. When you multiply this by hundreds of stalled projects, you can only sit down and cry over this appalling legacy of the UPA. It is a tribute to the new, positive energy released by Modi that instead of throwing up their hands, officials are trying to find answers – even the chalta hai civil servant is doing some remarkable things.

The systemic solution to this mess is an ambitious project tasked by Modi which could transform the clearance process. The same Project Monitoring Group is digitizing on a common platform 60 clearances required for setting up an industry in India – 25 at the centre and 35 in the states. When completed, entrepreneurs will be able to file applications online and track their progress transparently on the net. The world will also get to know who the offending official sitting on my file is, and entrepreneurs will come close to realising their dream of a single window.

Superior execution will go some ways to lift growth and create jobs but only significant reforms will achieve Modi’s first objective. Transparency in clearances will create accountability and slash India’s notorious red tape. But Modi would have got higher marks for furthering governance if he had tasked the group to cut down the sixty clearances to ten, and India’s dismal ranking would also have jumped on the Ease of Doing Business. When it comes to controlling food inflation, Modi’s government has been selling grain from excess reserves and this has brought down grain prices. But India’s food basket has changed and if he had cut import duties and removed non-tariff barriers on higher value foods, especially key vegetables, he would have scored higher on his third objective. Modi is lucky, however. The petroleum price has fallen and the monsoon is not disastrous, and if he is able to realize savings in government expenditure, it will help lower inflation.

In our obsession with accountability we have forgotten that the state was created to act. Modi’s three months teach us how an effective leader is able to enhance state capacity through outstanding implementation. To achieve his three objectives, however, Modi will have to bite the bullet and execute the second generation reforms and begin the reform of governance institutions.Importantly, he must rein in the saffron brigade which is becoming an unnecessary distraction to keeping his three promises

Monday, August 25, 2014

उम्मीद जगाने वाले 10 कदम

हम सब स्वतंत्रता दिवस पर नरेंद्र मोदी के भाषण से बहुत प्रभावित हुए। जवाहरलाल नेहरू के बाद से हमने लाल किले से ऐसा ताजगीभरा, उत्साह बढ़ाने वाला और ईमानदारी जाहिर करता भाषण नहीं सुना। मोदी हिंदू राष्ट्रवादी की तरह नहीं, भारतीय राष्ट्रवादी की तरह बोले। आदर्शवाद की ऊंची-ऊंची बातें नहीं कीं, कोई बड़ी नीतिगत घोषणाएं नहीं कीं और न खैरात बांटीं। आमतौर पर हमारे नेता बताते हैं कि वे हमें क्या देने वाले हैं। उन्होंने बताया कि हमें कौन-सी चीजें राष्ट्र को देनी चाहिए।
मोदी की शैली को वर्णित करने के लिए श्रेष्ठ शब्द हैं, व्यावहारिक, तथात्मक, गैर-आदर्शवादी और कार्यक्षम। वे नई नीतियों की घोषणा की बजाय नीतियों को अमल में लाने पर अधिक जोर देते हैं। जिन लोगों को बजट में धमाकेदार सुधारों की अपेक्षा थी, उन्हें निराशा हाथ लगी और जिन्हें असहिष्णु हिंदू तानाशाही के पुनरुत्थान की आशंका थी, वे आश्वस्त हुए हैं।
कांग्रेस ने हमें याद दिलाया कि मोदी सरकार तो सिर्फ यूपीए सरकार के एजेंडे की नकल कर रही है। अच्छे विचारों की नकल करना कोई बुरी बात नहीं है, यदि आप उन्हें अमल में लाकर दिखाएं। यूपीए सरकार के पास कई बेहतरीन विचार थे, लेकिन वह उन्हें अमल में लाने में नाकाम रही। मनमोहन सिंह वाकई आधारभूत ढांचे के क्षेत्र में बहुत कुछ करना चाहते थे, लेकिन उनमें अमल में लाने की काबिलियत नहीं थी।
यूपीए ने ‘वित्तीय समावेश’ का शोर तो बहुत मचाया पर इस दिशा में बहुत कम हासिल कर दिखाया। मुझे लगता है कि मोदी सरकार यह कर दिखाएगी। नौकरशाही के विरोध के बावजूद मोदी ने समझदारी दिखाकर यूपीए की आधार योजना को स्वीकार कर लिया। मोबाइल से भुगतान को जोड़ने वाली यह बायोमेट्रिक प्रणाली जल्द ही हर भारतीय को बैंक खाता खोलने में मददगार होगी। गरीबी रेखा के नीचे के लोगों को सब्सिडी की राशि नगद मिलेगी। इससे भ्रष्टाचार थमेगा।
सरकार का फोकस ‘बातें करने’ की बजाय ‘करने’ में है, इसके दस उदाहरण दिए जा सकते हैं। नजर आने वाला सबसे बड़ा परिवर्तन तो केंद्रीय नौकरशाही में पैदा हुआ आशावाद है। दिल्ली में बाबू लोग दफ्तरों में जल्दी आने लगे हैं, यह दूसरा बदलाव है। जनता को मिलने का समय जल्दी मिल रहा है, अधिकारियों का रवैया अधिक सहयोगभरा है, बैठकें वक्त पर शुरू हो रही हैं, कुछ तो जल्दी सुबह 9 बजे ही हो जाती हैं। तीसरा उदाहरण केरल की नर्सों को इराकी युद्ध क्षेत्र से 48 घंटों के भीतर घर लौटा लाने का है। इसने प्रशासन में नए पेशेवर अंदाज के दर्शन कराए।
चौथा, बरसों से ठप पड़ी परियोजनाओं को मंजूरी देने में दिखाया जा रहा उत्साह और ऊर्जा है। पांचवां, पड़ोसियों से रिश्ते सुधारने की दिशा में विदेश मंत्रालय में दिखाई जा रही सोदेश्यता व जोश है। यह हमारी बाहरी सुरक्षा का रूपांतरण कर सकता है। छठा, जन्म प्रमाण-पत्र, अंक सूची और इस जैसे अन्य दस्तावेजों के स्व-प्रमाणीकरण (सेल्फ अटेस्टेशन) की तरफ चुपचाप बदलाव। गांव में रहने वाली किसी गरीब विधवा को होने वाले फायदे की कल्पना कीजिए, जिसे पड़ोस के शहर में किसी अफसर से मिलने के लिए चक्कर लगाने पड़ते और आखिर में अपना काम कराने के लिए किसी दलाल या नोटरी को पैसे देने पड़ते थे। मूल दस्तावेजों की अंतिम चरण में जरूरत होगी, पर मीलों लंबा लाल फीता काट दिया गया है ।
सातवां कदम तीन प्रमुख श्रम सुधार हैं। हालांकि, इस मामले में केंद्र सरकार उतनी आगे नहीं गई है, जितनी राजस्थान सरकार, लेकिन इसने श्रम सुधारों की दिशा में दरवाजें खोल दिए हैं। इन सुधारों से हमारे आधे कारखानों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। कर्मचारियों का ज्यादा फायदा होगा और बिज़नेस करना आसान हो जाएगा। प्रशिक्षु रखने के खिलाफ भयानक कानून के खात्मे से कंपनियों के लिए प्रशिक्षु हासिल करना आसान बना देगा। इससे रोजगार देने वाले प्रवासियों खासतौर पर गांव से आने वाले लोगों को प्रशिक्षण देने के लिए प्रोत्साहित होंगे।
आठवां, श्रम मंत्रालय में इन्सपेक्शन को लेकर नए नियमों ने तो ‘इंस्पेक्टर राज’ पर चुपचाप प्रहार किया है। हम सब जानते हैं कि इंस्पेक्टर छोटी उत्पादन इकाइयों को परेशान करते हैं, लेकिन अब उन्हें ऊपर से अनुमति लेनी होगी और अपनी टिप्पणियां वेबसाइट पर डालनी होंगी। भ्रष्ट लेबर इंस्पेक्टर रातोंरात तो नहीं बदल जाएगा पर उसके व्यवहार पर अब कड़ा नियंत्रण होगा।
नौवां, सरकार ने भारतीय खाद्य निगम के गोदामों से अनाज बेचना शुरू कर दिया है और इससे बाजार में अनाज के दाम गिरने लगे हैं। दसवां, महंगाई से निपटने की एक पहल बजट में कृषि उपज विपणन समितियों द्वारा संचालित मंडियों का एकाधिकार तोड़ने संबंधी घोषणा है। इस पहल से आढ़तियों और थोक व्यापार के मठाधीशों में भय पैदा हुआ है, जिनके एकाधिकारवादी कमीशन अनाज की बढ़ती कीमतों के लिए आंशिक रूप से जिम्मेदार है। शीतगृहों की शृंखला निर्मित करने के निर्णय से किसानों को फायदा मिलेगा और उपभोक्ता के लिए कीमतें कम होंगी। केंद्र की ओर से किसान समर्थन मूल्य की सीमा तय करने का फैसला भी उत्साहवर्द्धक है। विडंबना यह है कि इससे भाजपा शासित मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ को ही सबसे ज्यादा चोट पहुंची है, जहां किसानों के वोट हासिल करने के लिए उन्हें जरा ज्यादा ही प्रीमियम दिया जा रहा था।
भारतीयों ने नरेंद्र मोदी को नौकरियां बढ़ाने, महंगाई घटाने और सुशासन के उनके वादे के कारण चुना है। उन्होंने लाखों नौकरियां निर्मित करने का वादा किया था। निवेश आने लगा है। निवेशकों में भरोसा पैदा होने से पूंजी बाजार में उछाल आया है। निर्माण क्षेत्र में रौनक लौटी है। यानी मोदी ने रोजगार बढ़ाने की दिशा में अच्छी शुरुआत की है।
महंगाई घटाने की बात है तो ऊपर बताए नौवें व दसवें महंगाई से लड़ने वाले ही कदम हैं। हालांकि, उन्हें और आगे जाने की जरूरत है। देश को परंपरा स्थापित कर देनी चाहिए कि कुछ जीवन आवश्यक चीजों की कीमतें यदि नाजायज तरीके से बढ़ रही हैं तो उनका नियमित रूप से आयात किया जाए। इससे आपूर्ति सुनिश्चित कर खाद्य पदार्थों में महंगाई से निपटने का सरकार का संकल्प जाहिर होगा। सबसे बड़ी बात, मोदी को सरकारी खर्च (खासतौर पर सब्सिडी) में कटौती करनी होगी, जो महंगाई का महत्वपूर्ण कारण है।
और आखिर में, मोदी ने ‘छोटी सरकार, बड़ा शासन’ का वादा किया था। इस मोर्चे पर उन्होंने कितना काम किया है? ऊपर बताए 1,2,6 और 7वें कदम सुशासन को लक्षित है। मोदी लोगों की अपेक्षाओं पर खरे उतरेंगे या नहीं, इस बारे में कुछ कहना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन उन्होंने बिना बड़ी गलतियां किए अच्छी शुरुआत तो कर ही दी है।

Friday, August 15, 2014

बदलाव की बड़ी तस्वीर

मोदी सरकार को सत्ता में आए करीब ढाई माह हो चुके हैं। इतने कम समय में किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचना अभी बहुत जल्दबाजी होगी, लेकिन बदलाव के संकेत दिखने लगे हैं और एक बड़ी तस्वीर स्पष्ट होने लगी है। हां, इतना अवश्य है कि जहां लोगों को आमूलचूल बड़े परिवर्तन की अपेक्षा थी वहां निरंतरता पर आधारित छोटे-छोटे बदलाव नजर आ रहे हैं। बजट में बहुत बड़े बदलाव की अपेक्षा पाले बैठे लोगों को भी कुछ निराशा हुई है। इसी तरह जो लोग अनुदार हिंदू तानाशाही के उभार का डर पाले हुए थे वे ऐसा कुछ न होने के प्रति आश्वस्त हुए हैं। प्रधानमंत्री न तो अधिक तेजी से अपने प्रशंसकों की तमाम बड़ी अपेक्षाओं को पूरा कर सकते हैं और न ही अपने दुश्मनों के डर को समूल खत्म कर सकते हैं। इससे पता चलता है कि भारत में किस तरह सत्ता का संचालन होता है। इस निरंतरता की सकारात्मक व्याख्या यही है कि यह भारतीय राज्य के दिनोंदिन अधिक परिपक्व होने को दर्शाता है। इसका नकारात्मक पहलू यह है कि मोदी भी शासन में रातोंरात बड़ा बदलाव शायद नहीं कर सकते। प्रधानमंत्री ने स्वयं भी इससे अपनी मौन सहमति जताई है। वह अधूरे पड़े कामों को पूरा करने में जुटे हैं और यह कोई खराब बात नहीं है। जैसा कि वह कहते भी हैं कि काम करने वाले ज्यादा बोलते नहीं।

इस सरकार द्वारा किए गए थोड़े बहुत किए गए कार्य यही बताते हैं कि मोदी सरकार का मंत्र मौन क्रियान्वयन है। इस संदर्भ में जो महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है वह केंद्रीय नौकरशाही के रुख-रवैये से संबंधित है। रिपोर्ट बताती हैं कि वही पुराने अफसर आम लोगों से अधिक आसानी से मिल रहे हैं, उनके फोन उठा रहे हैं और काम कर रहे हैं। समय पर मीटिंग हो रही हैं और यहां तक कि सुबह के नौ बजे भी अधिकारी बैठक कर रहे हैं। इराक में युद्ध क्षेत्र से जिस तरह 48 घंटों के भीतर केरल की नसरें को वापस उनके घर पहुंचाया गया वह प्रशासन के नए तौर तरीकों को दर्शाता है। दूसरा काम बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं में तेजी दिखाने का है, जिससे नए रोजगार अवसरों के सृजन की शुरुआत हुई है। तीसरा संकेत विदेश मंत्रालय में आए नए उत्साह और उद्देश्यपरकता का है। पड़ोसी देशों से संबंध सुधारे जा रहे हैं, जिससे हमारी सुरक्षा सुदृढ़ होगी। नेपाल, बांग्लादेश और भूटान के लोगों का नजरिया भारत के प्रति बदला है। इसी तरह एक और बड़ा प्रशासनिक बदलाव लोगों को प्रमाणपत्रों के प्रशासनिक अधिकारियों के द्वारा सत्यापन से निजात दिलाना है। अब जन्म प्रमाणपत्र, अंकपत्र आदि के सत्यापन के लिए राजपत्रित अधिकारियों के हस्ताक्षर अथवा नोटरी से हलफनामे की आवश्यकता नहीं होगी। आप गांवों में रहने वाली उन विधवाओं के बारे में कल्पना कीजिए जो सरकारी लाभ पाने के लिए एक अधिकारी से हस्ताक्षर कराने के लिए पूरे दिन यात्रा करने को विवश होती हैं और इसके लिए अंतत: उन्हें रिश्वत देनी पड़ती है। वास्तविक दस्तावेजों की आवश्यकता अब भी होगी, लेकिन लालफीताशाही खत्म होगी और ब्रिटिश राज की औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति मिलेगी।

इस क्त्रम में श्रम से संबंधित तीन बड़े सुधार किए गए हैं। हालांकि सरकार द्वारा इस दिशा में उठाए गए कदम पर्याप्त नहीं हैं, लेकिन इससे श्रम कानून में सुधार का रास्ता खुला है। इन सुधारों से कर्मचारी लाभान्वित होंगे और उद्योग-व्यापार कार्य अधिक आसान बनेगा। कंपनियों को नए कर्मचारियों की भर्ती करने में आसानी होगी और नियोक्ता नए लोगों को कौशल प्रशिक्षण देने के लिए प्रोत्साहित होंगे, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में। इसी तरह निरीक्षणों के संबंध में श्रम मंत्रालय के नए कानूनों से छोटी विनिर्माण इकाइयों को श्रम निरीक्षकों के भय से निजात मिलेगी। हमारे निरीक्षकों को याद होना चाहिए कि यह प्रणाली 1880 में अपनाई गई थी। उस समय निरीक्षण के दो प्रकार थे। एक संदिग्ध के खिलाफ, जिसमें उसकी खामियों-कमियों को खोजा जाता था ताकि उन्हें ठीक किया जा सके। दूसरा काम मित्रवत मार्गदर्शन का था, जिसकी सदिच्छा चीजों को ठीक करने की होती थी। यह सही है कि भ्रष्ट श्रम निरीक्षक रातोंरात बदल नहीं जाएंगे, लेकिन उनके व्यवहार को अब कड़ाई से नियंत्रित अवश्य किया जा सकता है। जहां तक महंगाई की बात है तो सरकार ने एफसीआइ के गोदामों में पड़े 50 लाख से एक करोड़ टन खाद्यान्नों को बेचने की बात कही है। महज इसकी घोषणा से बाजार में खाद्यान्न कीमतों में गिरावट आ गई। इस कदम को दूसरी अन्य महत्वपूर्ण चीजों के मामले में भी अपनाया जा सकता है। सब्जियों के मामले में भी अधिक तेजी से हवाई जहाजों के माध्यम से रणनीतिक आयात के द्वारा सरकार आपूर्ति बढ़ाकर महंगाई को नियंत्रण में ला सकती है। कृषि उत्पाद बाजार समितियों अथवा एपीएमसी के एकाधिकार को खत्म करने के लिए निजी किसान मंडियों का सहारा लिया जा सकता है। बजट में शीतभंडारण गृहों की श्रृंखला स्थापित करने की बात कही गई है, इससे किसानों को लाभ होगा और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमत में कमी आएगी।

संप्रग सरकार के समय में शुरू की गई आधार योजना अधिक तर्कसंगत बनाने की बात कही गई है, जो अच्छा कदम है। भुगतान के लिए बायोमीट्रिक तकनीक को मोबाइल फोन से जोड़े जाने से हजारों करोड़ की बचत होगी। इस तरह जवाबदेह प्रशासनिक कामकाज से आम लोगों को लाभ होगा। कुछ नकारात्मक बातें भी हुई हैं। मेरे विचार से डब्ल्यूटीओ वार्ता में भारत को विघ्नकर्ता की भूमिका नहीं निभानी चाहिए। भारत कृषि का बड़ा निर्यातक देश है और यह हमारे हित में है कि लालफीताशाही कम हो और सीमा शुल्क संबंधी औपचारिकताएं तर्कसंगत हों। भारत कमजोर बहुपक्षीय प्रणाली को कमतर आंक रहा है, जिससे अंतत: हमें ही सर्वाधिक लाभ होना है। कुल मिलाकर मोदी सरकार के कामों और उनकी कार्यशैली को देखते हुए हम कह सकते हैं कि नया मंत्र मौन क्रियान्वयन है। बहुत अधिक बातें और काम बहुत थोड़ा करने वाले हमारे देश में यह कार्यप्रणाली एक ताजी हवा की तरह है। जो लोग 15 अगस्त को प्रधानमंत्री से एक दूरदर्शी भाषण की अपेक्षा कर रहे हैं उनका इंतजार आज खत्म होगा।

Sunday, August 03, 2014

Two months on, mantra’s clear: Less talk, more action

It’s been a little over two months since the Modi sarkar came to power. Too soon, perhaps, for a definitive assessment, but there are signs of change; patterns are emerging; and even hints of a larger picture. Where we had expected discontinuity there is surprising continuity. This may say something about the evolution of authority, a maturing of the Indian state. Those who expected big bang reforms are disappointed and those who feared an intolerant autocracy are reassured. Modi himself has been remarkably silent. He has been busy getting things done — those who act often say little. Here is a brief inventory with positive and negative examples.

The most palpable change is an upbeat mood in the central bureaucracy. No straggling in at 11 am. There are reports of quick appointments to the public; the same arrogant officer comes on the phone line, and is more helpful; meetings begin on time, some as early as 9 am. The manner in which nurses from Kerala were brought home from Iraq’s war zone in 48 hours showed a new professionalism. Another change is the quiet way that infrastructure projects have got going and begun to create jobs. There is a sense of purpose and vigour in repairing relations with our neighbours that could transform our security.

The noiseless shift to self-attestation is a major administrative reform. Documents — such as birth certificates, mark sheets etc — no longer require to be attested by gazetted officers or affidavits by notaries. Imagine the benefit to a poor village widow who travelled a whole day to find an officer and finally ended up paying a tout or a notary. Original papers are still needed but miles of red tape have been cut, and a 150-year-old process decolonized.

Three archaic labour laws are about to be scrapped, enhancing employee benefits and making it easier to do business. New rules on inspections have also struck a quiet blow against the dreaded inspector raj. Merely the announcement that five to ten million tons of grain from the FCI stockpile will be sold has reduced grain prices. Tactically importing a few planeloads of vegetables will underline the resolve to fight food inflation through augmenting supply. The announcement to break the monopoly of the feared Agricultural Produce Marketing Committees (APMCs) through private mandis is also antiinflationary and has instilled fear among wholesale warlords. So is the courageous cap on farmer support prices that has offended both BJP-ruled MP and Chhattisgarh.

The pragmatic restoration of Aadhar, despite the BJP’s and the bureaucracy’s hostility, is an example of continuity. This biometric technology linked to payments through mobile phones will save thousands of crores and lead to clean, accountable governance while easing the aam aadmi’s life. With its focus on implementation, this government will fix its minor glitches and cover the whole country in two years. Now to a few negatives. India should not have played ‘spoiler’ in the recent WTO talks. India is a major agriculture exporter and it is in our interest to cut red tape and harmonize customs formalities. By insisting on linking trade facilitation to food security issues, India has undermined the fragile multilateral system that benefits India the most. By not applying its mind, the Modi government became a victim of bureaucratic capture.

While it is virtuous to act rather than speak, Modi should have spoken boldly in the recent spate of Hindutva incidents. He should have countered the Goa minister’s claim — India is not a Hindu rashtra, which is why it is different from Pakistan; condemned the Shiv Sena goons for force-feeding a Muslim during Ramzan; and publicly distanced himself from the vision of ‘akhand Bharat’ in Batra’s textbooks that risk undoing his government’s fine work in building trust with our neighbours.

This is not an exhaustive list but it points to a mantra of quiet execution, which matters in a country with too much talk and too little action. Those expecting visionary statements should wait for August 15.

Tuesday, July 15, 2014

कई बातें स्पष्ट कर सकते थे जेटली

नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने दो माह हो गए और यह बिल्कुल स्पष्ट हो गया है कि यह एक 'मोदी सरकार' है। उन्होंने सरकारी दफ्तरों के शीर्ष पर बैठे सभी प्रमुख सचिवों से सीधा संपर्क स्थापित कर लिया है। वे उन्हें फैसले लेने और यदि कुछ गड़बड़ हो जाता है तो उनसे संपर्क करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। सचिवों और प्रधानमंत्री के बीच मंत्रियों की दुविधापूर्ण स्थिति है, कैबिनेट के साधारण दर्जे को देखते हुए यह शायद अच्छा ही है। मंत्री तो खुश हो नहीं सकते। उन्हें रिश्तेदारों को नौकरियां देने की मनाही है। वे फैसलों में व्यक्तिगत हित नहीं देख सकते।
महीनों की बातों के बाद अब हम कुछ होता देखना चाहते हैं। यह मौका पिछले हफ्ते आया जब इस सरकार ने अपना पहला बजट पेश किया। मोदी ने वित्तीय अनुशासन कायम करने के लिए जरूरी 'कड़े' फैसलों की बात कही थी। ऐसे फैसले, जिनके कारण लोगों की नाराजी का जोखिम था। हालांकि, बजट में ऐसा कुछ नहीं हुआ। कड़े फैसले लेने का मौका सरकार ने गंवा दिया।
बजट में ऐसे भारत के लिए नरेंद्र मोदी का रणनीतिक विज़न कहीं नजर नहीं आया, जिसे तेजी से आगे बढ़ने और सभी के लिए अवसर निर्मित करने की जरूरत है। यह बजट तो ऐसा लगा जैसे यूपीए सरकार के पुराने नौकरशाहों ने तैयार किया हो, कि किसी विज़नरी नई सरकार ने। बजट में निरंतरता दिखाई दी जबकि जरूरत बदलाव की थी। वित्तमंत्री अरुण जेटली को अपने पहले बजट का इस्तेमाल पांच साल का विज़न रखने में करना चाहिए था। उन्हें बताना चाहिए था कि क्यों यूपीए शासन में आर्थिक वृद्धि आधी रह गई और इसे पटरी पर लाने के लिए कौन से कड़े फैसले करने होंगे। उन्होंने यह नहीं किया और एक बड़ा मौका खो दिया।
भाजपा ने इस साल फरवरी में पेश चिदंबरम के अंतरिम बजट के आंकड़ों को हकीकत से दूर और हासिल करने में असंभव बताया था। मगर अब जेटली ने उन्हीं आंकड़ों को स्वीकार कर लिया है। नई सरकार को बजट संबंधी खातों पर स्पष्ट बात करने का मौका मिला। फिर चाहे इसका मतलब ऊंचे वित्तीय घाटे को स्वीकार करना ही क्यों हो। जेटली के कुछ आकड़े उतने ही खोखले नजर आते हैं, जितने चिदंबरम के थे। करों से होने वाली अामदनी 17.4 फीसदी से बढ़ने की बात कही गई है, लेकिन इस पर भरोसा नहीं होता। जीडीपी वृद्धि में मामूली इजाफे से यह आंकड़ा 13 से 14 फीसदी (9 फीसदी तो मुद्रास्फीति प्लस 5 फीसदी वास्तविक जीडीपी वृद्धि) से ज्यादा जाने की संभावना नहीं है। फिर सालाना वित्तीय घाटे का 45 फीसदी तो इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में ही हो गया है।
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह असाधारण रूप से बुरा वक्त है। मुद्रास्फीति (महंगाई) तो बहुत बढ़ गई है और आर्थिक वृद्धि बहुत कम है। ऊंचा वित्तीय घाटा महंगाई की स्थिति को और भी खराब बना रहा है। इसके कारण निजी क्षेत्र निवेश करने से कतरा रहा है। चालू खाते के घाटे को तो वृद्धि ठप होने और सोने के आयात पर नियंत्रण रखकर काबू में रखा गया है। मानसून बहुत खराब रहने का अनुमान व्यक्त किया गया है। इससे कीमतें और बढ़ने की आशंका है। दुनिया की स्थिति देखते हुए कह सकते हैं कि कच्चे तेल की कीमतें भी अासमान छू सकती हैं। शेयर बाजार जरूरत से ज्यादा ऊंचा जा रहा है और यदि कोई बुरी खबर आई तो पूंजी बाहर जाने लगेगी और इसे धराशायी होते देर नहीं लगेगी। इस बजट में ऐसी सब आपात स्थितियों का अनुमान लगाकर इन धक्कों को बर्दाश्त करने की व्यवस्था की जानी चाहिए थी। इसकी बजाय बजट से वित्तीय संतोष झलकता दिखाई देता है।
हो सकता है मैं कुछ कठोर बातें कर रहा हूं और अधैर्य जता रहा हूं। क्योंकि यह सच है कि सरकार को अस्तित्व में आए सिर्फ दो ही महीने हुए हैं और उठाए जाने वाले कई कदमों में से ये शुरुआती कदम ही हैं। िवत्तमंत्री जेटली ने यह जरूर माना कि यह बजट दिशा देने वाला है। इसमें कोई विस्तृत ब्ल्यू प्रिंट नहीं है। नई सरकार को विज़न को साकार करने के लिए वक्त देना होगा।
बजट में कई अच्छी चीजें हैं। आधारभूत ढांचे और रीयल एस्टेट को वाकई प्रोत्साहन गति दी गई है। इन दोनों क्षेत्रों का संबंध निर्माण श्रम से है और इससे बड़ी संख्या में रोजगार पैदा होगा। महंगाई रोकने के कदम भी इसमें हैं। जेटली की जगह यदि मैं होता तो बताता कि कैसे यह बजट रोजगार पैदा करेा और महंगाई को काबू में लाएगा। ये दो मुद्दे ही तो लोगों के दिमाग पर छाए हुए हैं। यह मौका भी गंवा दिया गया।
‌मोदी और जेटली को पूर्ववर्ती सरकार की गलतियों से सीखना चाहिए और जोर देकर आर्थिक सुधारों का माहौल तैयार करना चाहिए। उन्हें लगातार राष्ट्र को इस बारे में शिक्षित करना चाहिए कि सुधारों और नौकरियों, आगे बढ़ने के मौकों और समृद्धि के बीच क्या संबंध है। उन्हें लोगों को बताना चाहिए कि स्पर्द्धा आधारित बाजार और नियमों पर आधारित पूंजीवाद ही समृद्धि का वाहक हो सकता है। उन्हें नियम कायदों पर चलने वाले पूंजीवाद और दोस्ती-यारी पर चलने वाले पंूजीवाद (क्रोनी कैपिटलिज्म) में फर्क बताना चाहिए। उन्हें बताना चाहिए कि सरकारी खैरात बांटने से नहीं, आर्थिक सुधारों से अच्छे दिन आएंगे।
अब अगले कदम क्या होने चाहिए? यदि यह सरकार वित्तीय घाटे को निशाना बनाना चाहती है तो इसे जल्दी से सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और बैंकों का विनिवेश शुरू कर देना चाहिए। अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए यह विनिवेश के जरिये 60,000 करोड़ रुपए की राशि खड़ी कर सकती है। पिछली सरकार ने पिछले तीन साल में जो हासिल किया है यह उससे तीन गुना अधिक है। इसे अनावश्यक सब्सिडी की भी कटौती शुरू कर देनी चाहिए। जेटली ने एक व्यय अायोग गठित करने की घोषणा की है। इस आयोग को जल्दी रिपोर्ट देनी चाहिए ताकि जेटली सब्सिडी में कटौती से आधे साल में संभव बचत पर गौर कर सकें। मोदी की कैबिनेट को जल्दी से भू-अधिग्रहण के नए नियम बनाने चािहए, जिनके अभाव में बहुत से मैन्यूफैक्चरिंग प्रोजेक्ट अटके पड़े हैं। इसी प्रकार श्रम कानूनों के कारण औपचारिक नौकरियां निर्मित नहीं हो पा रहीं। इस सरकार को केंद्र में श्रम कानूनों में सुधार की शुरुआत करनी चाहिए (जो राजस्थान सरकार राज्य स्तर पर कर रही है)।
जेटली के निराशाजनक प्रदर्शन से भविष्य के वित्तमंत्रियों के लिए एक सबक है। पूर्ववर्ती वित्तमंत्री लंबे भाषण देकर िवस्तृत ब्योरे देकर मतदाताओं के हर वर्ग को खुश करने का प्रयास करते थे। जेटली ने िजतने भी मतदाता वर्ग की कल्पना की जा सकती है, उन सबके लिए छोटी-छोटी परियोजनाओं की घोषणा की। वित्तमंत्री को हर 100 करोड़ के उस प्रोजेक्ट के बारे में बताने पर दो घंटे बर्बाद करने की जरूरत नहीं है, जो वह आगे अमल में लाने वाला है। उसे तो आधे घंटे में सरकार का विज़न स्पष्ट कर यह बताना चाहिए कि किस प्रकार बजट इस विज़न को पूरा करेगा। सरकार के बजट को लोगों तक पहुंचाने का यह है राजनीतिज्ञ जैसा तरीका।

Tuesday, July 08, 2014

After months of talk, it’s go time for new PM

John Ruskin, the 19th century British art critic, once re marked that the greatest contribution that an aristocratic duke could make to the modern world would be to take a job as a grocer. This apparently bizarre suggestion goes to the heart of middle-class dignity -an idea that I identified in my last column to explain the significance of Narendra Modi’s victory. In our unequal, hierarchical Indian society, we need to correct our misguided notion about what constitutes a dignified life. Much like Ruskin’s Victorian society, Indians believe that dignity is not compatible with being a petty kiranawallah. When so many people work in shops, this prejudice is cruel and destructive -it cuts off decent, hardworking people from the respect of others and from self-respect.

Modi’s landslide victory invites us to be more imaginative in thinking about the nature of human dignity , to move from prejudice to a question. By electing a chai-wallah’s son, who affirmed the aspirations of the millions who have pulled themselves up in the post-reform decades through their own efforts into the middle-class, we are forced to challenge our assumption that selling vegetables is socially degrading. If an upper-class zamindar, who takes time off from his idle life of breeding race horses to stand behind a counter in the belief that supplying people with good vegetables at a fair price, or driving them to their destination in a three-wheeler, is inherently worthwhile, the prejudice might give way to a fairer assessment of human worth.

Ruskin is not only challenging how we judge shopkeepers; he also wants shopkeepers to take their own dignity more seriously . Modi’s victory has made us believe that: 1) anyone can aspire to middle-class status; 2) if one imbibes its values of thrift, ambition, industry and prudence; and 3) a middle-class society is a good society.

Narendra Modi has now been prime minister for six weeks and it is abundantly clear that this is a “Modi Sarkar“. He has established direct contact with secretaries at the head of government departments, encouraging them to take decisions and get in touch with him if things go sour. Ministers have an ambiguous place in this setup, which is probably a good thing considering the mediocre level of his cabinet. Ministers could not be happy -they have been forbidden to hire relatives or introduce personal considerations in their decisions.

Otherwise, this has been a period of welcome silence and calm after the din and clatter of the election. Now we need to see some action after months of talk. In one respect Modi should not be silent. He should learn from his predecessor’s mistake and insistently make a compelling political case for economic reform. He must keep educating Indians about the link between reforms, jobs, opportunities and prosperity . He needs to explain that only the competitive market (not giveaways) can deliver a middle-class society and that a rules-based capitalism leads to dignity, not crony capitalism. Unfortunately, he frittered away a golden opportunity to do this in the disappointing address of the President.

Modi has spoken about “tough“ decisions that are urgently needed to enforce financial discipline, and they risk losing popular good will. With this warning he has set the stage for a hard-nosed budget on Thursday. When it comes to price increases, he would do well to follow TN Ninan’s advice -take price increases in small bites and frequently, and avoid the fiasco over the increase in railway fares.

Achche din aane wale hain (Good days are coming), was Modi’s response to his victory.

Those few words carry a massive burden of aspirations but with a clear majority in the Lok Sabha and supremacy in his own party , he is the first Indian leader in a long time to have the freedom to act on his convictions. He is getting plenty of advice -the politico-bureaucratic system is trying to co-opt him, attempting to make him one of its own. He is being advised to be prudent, to make incremental changes and not unsettle the system. But he must not forget that an aspiring nation has elected him precisely because he is an outsider and wants him to shake up the system. So, he must not listen too much to others and follow his own dharma.