Sunday, July 19, 2015

Wanted: Vyapam reforms to overhaul our democracy

Something has gone terribly wrong with our republic. There are ominous clouds over the approaching monsoon session of Parliament. When MPs should be deeply concerned with the fragile nature of our economic recovery, debating how to create a million jobs a month, they are straggling back to work in a stupor having forgotten why they were elected. Meanwhile, an MP drives away from a car accident where a child has been killed; a minister calls the death of a journalist probing Vyapam a ‘silly issue'; a politician slaps a passenger on the Chennai Metro; and a UP minister has an inconvenient journalist burned to death. The rest of the fraternity is glued to the TV set watching an endearing puppeteer manipulate the fortunes of a foreign minister and a chief minister. But Lalitgate has been overtaken by the more serious and sinister Vyapam scam. The Congress party has threatened to throw Parliament’s monsoon session into chaotic paralysis unless ministers of the ruling party resign. The BJP’s leaders have their eyes only on the approaching Bihar election.

Surely, India deserves better politics. First, the country is continuously in election mode, and this delays crucial reforms and executive decisions. Instead of worrying about jobs, BJP’s leadership is concerned only about controlling the damage of Lalitgate and Vyapam before the Bihar election. Secondly, legislators are in double training on how to jump into the well, disrupt Parliament and drown the nation’s agenda. The BJP did it the last time and the Congress is promising tit for tat. The people be damned — no one cares about the delay in the GST or the land acquisition law or the lives of the jobless young — as long my salary as an MP is doubled.

Instead of wringing our hands in dismay, we can implement some fairly simple political reforms. First, force our Speakers to exercise powers that they already possess in order to discipline rowdy, disruptive members. Irish MPs in Britain used to be physically picked up by marshals and thrown out onto the street until they realized that the punishment was too costly. Second, make MPs work longer. Why does India’s Parliament meet for 67 days in a year when Britain’s meets for 150 days and the US Congress for 200? Why is our monsoon session only for three weeks and not three months? Allow Parliament to be summoned if two-thirds of the members want it, as in the UK. Give the opposition a chance to let off steam and set the work agenda. In the UK, leader of the opposition sets the agenda for 20 out of 150 days.

Third, India should adopt fixed-term elections, as the UK has just done and other democracies did long ago. Whereas the Constitution envisaged a five-year electoral cycle, state governments have insisted on falling, upsetting the cycle. If legislatures had a fixed term, they would not be hostage to the whims of the leader of the majority party. Elections would be held on two fixed dates, every five years at the Centre and every two-and-half years in the states. If a government fell in a no-confidence vote, the House would not be dissolved; legislators would be forced to cobble a new government or face President’s rule. LK Advani suggested fixed-term elections; Sharad Pawar endorsed it and included it in the Nationalist Congress Party’s manifesto. Manmohan Singh and Pranab Mukherjee liked the idea but the UPA did not implement it. Today, the Nachiappan Committee is seriously examining it. Although Advani wanted simultaneous state and central elections, I think an interim date, halfway through the five years, gives some protection against an unusually foul government.

The fourth reform is to replace the present ‘no-confidence motion’ with a ‘constructive vote of non-confidence’ as in Germany, which means you can only bring down the government if you have an alternative in place. This will also bring more stability. Finally, separate legislators from sports bodies. Lalitgate may not have happened if sports officials had to resign by law on the day that they became legislators. A successful democracy is, in the end, a daily performance and it is time we looked our legislators in the eye, reminding them that pigs can’t fly nor walk on two legs, and do not take us for granted.

Tuesday, June 16, 2015

व्यापारिक भूतकाल, मौजूदा कूटनीति

बांग्लादेश के साथ हुआ समझौता ऐतिहासिक है। इससे कश्मीर जितना ही पुराना विवाद तो हल हुआ ही, उपमहाद्वीप को साझा बाजार की ओर बढ़ने में भी मदद मिली है। व्यापार और निवेश पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अथक कूटनीति का ताजगीदायक फोकस है। सत्ता में आने के बाद से ही हमारे पड़ोसियों की जरूरतों पर उन्होंने बहुत निकटता से गौर किया है, जिसका फल अब सामने आ रहा है। हालांकि, समझौते पर बरसों से काम हो रहा था, लेकिन इतिहास इसका श्रेय मोदी को देगा। अन्य किसी भारतीय नेता की तुलना में उनमें यह सहज समझ है कि सत्ता धान के कटोरे से आती है न कि बंदूक की नली से, जैसा कि माओ का विश्वास था। इस संदर्भ में वे प्राचीन परंपरा का ही अनुसरण कर रहे हैं, जिसने भारत को एक महान व्यापारिक राष्ट्र बना दिया था, जो अपने व्यापारिक जहाजों पर अपनी अद्‌भुत सॉफ्ट पावर विदेश ले जाता था।

हालांकि, भू-सीमा संबंधी समझौते के अलावा अन्य समझौते भी उतने ही महत्वपूर्ण थे। आज भारत के मालवाही पोत सिंगापुर होते हुए तीन हफ्ते में बांग्लादेश पहुंचते हैं, समझौते के बाद वे एक हफ्ते में ही पहुंच जाएंगे। भारतीय कंपनियां बिजली बेचेंगी और बांग्लादेश के विशेष आर्थिक क्षेत्र में उत्पादन करेंगी। इससे न सिर्फ बड़े पैमाने पर नौकरियां पैदा होंगी बल्कि बांग्लादेश के साथ व्यापार घाटा कम करने में भी मदद मिलेगी। इस समझौते से नेपाल, श्रीलंका और पाकिस्तान को संदेह की राजनीति से हटकर समृद्धि के अर्थशास्त्र की ओर बढ़ने के फायदे का इशारा मिला है। सबसे महत्वपूर्ण तो यह है कि यह ऐतिहासिक समझौता भारत के अद्‌भुत व्यापारिक भूतकाल पर आधारित है। भारतीय यह भूल गए हैं कि पांच हजार मील लंबी तटीय रेखा के साथ भारत का समृद्ध व्यापारिक इतिहास रहा है। एक दौर तो ऐसा भी रहा जब विश्व व्यापार के चौथाई हिस्से (आज के दो फीसदी की तुलना में) पर इसका प्रभुत्व था। यदि आप दो हजार साल पहले केरल के प्रसिद्ध मुझिरिस बंदरगाह पर खड़े होते तो आपको सोने से लदे जहाज लौटते दिखाई देते। रोज एक जहाज रोमन साम्राज्य से दक्षिण भारत के तट पर आता और उस पर आला दर्जे का कपड़ा, मसाले और विलासिता की चीजें लादी जातीं। उधर, रोमन सीनेटर शिकायत करते कि साम्राज्य की महिलाएं विलासिता की भारतीय चीजें, मसाले और ऊंचे दर्जे का कपड़ा इतना इस्तेमाल करती हैं कि रोम का दो-तिहाई सोना-चांदी भारत चला जाता है। (खेद है कि तमिल संगम काव्य में जिसे मुसिरी कहा गया है, वह मुझिरिस 14वीं सदी की पेरियार बाढ़ में बह गया और उसकी जगह आधुनिक कोच्चि ने ली।

पंद्रह सौ साल बाद पुर्तगालियों की भी यही शिकायत थी : दक्षिण अमेरिका से कमाया उनका सोना-चांदी व्यापार में भारत चला जाता है। ब्रिटिश संसद में इसकी गूंज 17वीं सदी में सुनाई दी। भारतीय कपड़े और मसालों ने दुनिया भर में कपड़े पहनने व खाने-पीने की आदतें ही बदल दी थीं। यूरोप के लोगों ने 17वीं सदी में तब अंतर्वस्त्र पहनने शुरू किए जब उन्हें ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा लाए मुलायम व सस्ते भारतीय कपड़े का पता चला। मुल्तान में पंजाबी खत्री 16वीं से 19वीं सदी तक अपने सामानों का कारवां हिमालय के आर-पार ले जाया करते थे, जिससे फारस से लेकर रूस तक जीवन-शैली में काफी बदलाव आया। एक फ्रांसीसी भिक्षुक ने ईरान के सफाविद साम्राज्य की तुलना दो दरवाजे वाली सराय से की थी। सोना-चांदी पश्चिमी दरवाजे से अंदर आते और पूर्वी दरवाजे से भारत की ओर निकल जाते। सोने के प्रति भारत का प्रेम ऐतिहासिक रूप से सकारात्मक व्यापार संतुलन पर आधारित रहा है। जब तक कि 19वीं सदी में इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति ने इसे बदल नहीं दिया और लंकाशायर की मिलों ने हमारे हथकरघा उद्योग को तकनीक के स्तर पर बेकार नहीं कर दिया। चूंकि भारत दुनिया अग्रणी कपड़ा निर्यातक था, भारतीय बुनकरों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा। भारतीय राष्ट्रवादियों ने बुनकरों के हश्र का दोष व्यापार को दिया, जो गलत था, क्योंकि कारण तो नई टेक्नोलॉजी थी। स्वतंत्रता के बाद हमने अपना व्यापारिक भूतकाल भुला दिया। ‘इंपोर्ट सब्स्टीट्यूशन’ के फर्जी विचार के नाम पर अपनी सीमाएं बंद कर लीं और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की समृद्धि से खुद को वंचित कर लिया। हमने अपने दरवाजे 1991 में जाकर खोले। आज मोदी भूतकाल के इस नुकसान की भरपाई करने में लगे हैं। मगर उन्हें आरएसएस के स्वदेशी जागरण मंच जैसे संरक्षणवादियों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है, जिन्हें यह नहीं समझ में आता कि व्यापार ऐसी गतिविधि है, जिसमें खरीदने व बेचने वाले दोनों को फायदा होता है।

भारत की शक्ति हमेशा से ही ‘सॉफ्ट’ रही है, जो सैन्य विजयों से नहीं बल्कि सामानों व विचारों के निर्यात में व्यक्त होती रही है। संस्कृत के महान विद्वान शेल्डन पोलॉक हमें याद दिलाते हैं कि चौथी और पांचवीं सदी भारत का प्रभाव दक्षिणपूर्व और मध्य एशिया में चारों तरफ फैल गया था। व्यापक क्षेत्र में संस्कृत दरबारों, सरकारों और साहित्य की भाषा बन गई थी। कुलीन वर्ग विभिन्न भाषाएं बोलता था, लेकिन सीमा पार संपर्क के लिए संस्कृत का प्रयोग करता था। यह तो पक्का पता नहीं कि भारतीय संस्कृति विदेशों में कैसे पहुंची पर प्रबल संभावना यही है कि ऐसा व्यापार के जरिये ही हुआ होगा। तमिल साहित्य में ऐसे वर्णन बहुत हैं, जिसमें समुद्री व्यापारी सोने की तलाश में जावा जैसे सुदूरवर्ती क्षेत्रों में जाते थे। ये लंबी समुद्री यात्राएं हुआ करती थीं और व्यापारी अपने साथ ब्राह्वणों व बौद्ध भिक्षुओं को ले जाते थे ताकि विदेशी भूमि पर भी उनके नाविक अपनी धार्मिक रीति-रिवाजों को पूरा कर सकें। इतिहासकार माइकल वुड ने कहा है, ‘इतिहास तलवारों के बल पर साम्राज्य खड़े करने के उदाहरणों से भरा पड़ा है पर भारत ऐसा अकेला देश है, जिसने संस्कृति व अध्यात्म का साम्राज्य निर्मित किया।’

स्वतंत्रता के इन 68 वर्षों में हमारे पड़ोसी हमें नापसंद करने लगे। हमारी विदेश सेवा के अधिकारी उनके साथ तिरस्कारपूर्ण व्यवहार करते। वे हम पर संदेह करते हैं और कहते कि वे ‘भारत के बहुत निकट और ईश्वर से बहुत दूर हैं।’ हालांकि, उनके प्रति मोदी का रवैया भिन्न रहा है और उनकी उत्साहपूर्ण कूटनीति ने बांग्लादेश समझौते के रूप में पहला इनाम हासिल किया है। इसने संभावनाओं के नए युग का द्वार खोला है। यदि वे इसी प्रकार जोर देते रहे और हमारे प्रशासन उसका फॉलो-अप लेते रहे तो पड़ोसियों के साथ भारत के रिश्ते बदलेंगे और हमारा देश फिर उस वर्णन का हकदार हो जाएगा, जो 7वीं सदी के चीनी यात्री ह्वेनसांग ने किया था : ‘दूर के स्थानों और विविध परंपराओं के लोग आमतौर पर उसी भूमि का उल्लेख करते हैं, जिसकी वे इंडिया कहकर सराहना करते हैं।’

Sunday, June 14, 2015

Modi is building on India’s wondrous trading past

Last week’s historic accord with Bangladesh erased a dispute as old as Kashmir while nudging the subcontinent towards a common market. Trade and investment have been the refreshing focus of Prime Minister Narendra Modi’s diplomacy. He understands instinctively that power emanates from a bowl of rice, not from the barrel of a gun. In this respect, he is following an ancient tradition that once made India a great trading nation that carried its amazing soft power on merchant ships.

Although the land boundary agreement was the most visible victory during Modi’s visit, other accords were equally significant. Indian goods travel via Singapore to reach Bangladesh in three weeks; now they will go directly to Bangladeshi ports in a week. Indian companies will sell electricity and make goods in special economic zones across the border, creating masses of jobs while helping reduce Bangladesh’s trade deficit. The accord signals to Nepal, Sri Lanka and Pakistan the benefits of moving from the politics of suspicion to the economics of prosperity.

If you had stood at the famous port of Muziris in Kerala 2,000 years ago, you would see a ship arriving laden with gold. Every day a ship from the Roman Empire landed in a South Indian port where it picked up fine Indian cottons, spices, and luxuries. But Indians did not care for what the Romans brought, and since accounts had to be settled, they were settled with gold and silver. Back home, Roman senators grumbled that their women used too many Indian luxuries, spices and fine cottons and two-thirds of Rome’s bullion was being lost to India. One South Indian king even sent an embassy to Rome to discuss the empire’s balance of payments problems.

Fifteen hundred years later, the Portuguese had the same complaint: their gold and silver from South America was being drained in the trade with India. The British parliament echoed this refrain in the 17th century. Indian textiles and spices changed culinary tastes and clothing habits around the world. Europeans began to wear underwear only in the 17th century when they discovered soft and affordable Indian cloth brought by the East India Company. In antiquity, the flowing togas of upper class Romans were made from Indian cloth. Punjabi Khatris in Multan led caravans across the Himalayas from 16th to 19th centuries, changing the lifestyle of the people all the way to Russia.

With a 5,000-mile coastline, India has historically been a great trading nation and in some periods, commanded as much as 20% share of world trade (compared to 2% today). It always had a positive balance of trade with the world until the Industrial Revolution in 19th-century England when the mills of Lancashire made our handloom textiles technologically obsolete. After Independence we forgot our trading past, closed our borders in the name of a bogus idea called ‘import substitution’, denying ourselves the prosperity of international trade. We only opened up in 1991. Today, Modi is trying to recover that past while quietly burying the foolish protectionism of RSS’s Swadeshi Jagran Manch, even as he promotes ‘Make in India’.

India’s power has always been ‘soft’, not expressed through military conquest but in the export of goods and ideas.The great Sanskrit scholar, Sheldon Pollock, reminds us that between the fourth and 12th centuries the influence of India spread across Southeast and Central Asia. Across the vast area, Sanskrit became the language of the courts, government and literature. much like Latin in medieval Europe.The elite spoke different languages but used Sanskrit to communicate across the border. We are not sure exactly how Indian culture travelled but most likely it was through trade. Tamil literature describes seafaring merchants sailing to distant places like Java in search of gold. The historian, Michael Wood, summed it up well: “History is full of Empires of the Sword, but India alone created an Empire of the Spirit.”

In recent times our neighbours have grown suspicious of us and declare that they are ‘too close to India and too far from God.’ However, Modi’s economic diplomacy is creating new possibilities. If he is successful, India may become once again become worthy of the seventh-century Chinese traveller, Xuanzang’s description: “People of distant places with diverse customs generally designate the land they admire as India.”

Tuesday, May 26, 2015

साहसी फैसले न होने से निराशा

राजनीति थोड़े वक्त का खेल होता है, जबकि अर्थव्यवस्था लंबे समय का। दोनों आखिर में मिलते हैं, लेकिन बीच के समय में वे विपरीत दिशाओं में जाते लगते हैं। इस विरोधाभास के कारण ज्यादातर लोगों का निराश होना अपरिहार्य है। अपनी सरकार की पहली वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यही समस्या है। अच्छे रेकॉर्ड के बावजूद वे अपने समर्थकों की असाधारण रूप से ऊंची अपेक्षाओं को मैनेज करने में नाकाम रहे। मुख्य प्राथमिकताओं पर निगाह न रख पानेे से योजनाएं अमल में लाने की उनकी योग्यता संदेह के घेरे में आ गई। संघ परिवार लगातार सरकार के लिए शर्मनाक स्थिति पैदा करता रहा है। सबसे बड़ा आश्चर्य तो यह रहा कि वे साहसी सुधारक की बजाय व्यावहारिक व धीरे-धीरे सुधार लाने वाले प्रधानमंत्री बन गए। दक्षिणपंथ से राजनीतिक मध्य में आकर उन्होंने अपने ज्यादातर मतदातावर्ग को नाराज कर दिया है।

अर्थव्यवस्था एक वर्ष पहले की तुलना में बेहतर है, हालांकि यह इसकी असली क्षमता के आस-पास भी नहीं पहुंच सकी है। जीडीपी वृद्धि दर ने रुख बदल लिया है। भारत अगले साल तक चीन को पीछे छोड़कर दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बन जाएगा। मुद्रास्फीति 18 माह की तुलना में आधी रह गई है। पिछले सालभर रुपया सबसे स्थिर मुद्राओं में से एक रहा है। सरकार की वित्तीय सेहत अच्छी है। वित्तीय व चालू खाता, दोनों काबू में हैं- और बाहर से पूंजी का आना 91-92 के बाद सबसे अधिक है। बीमा तथा रक्षा क्षेत्र का उदारीकरण और डीजल को नियंत्रण मुक्त कर दिया गया है। कोयले का उत्पादन तो 8.3 फीसदी बढ़ा है, 23 साल में सर्वाधिक, जिससे कई पावर प्लांट फिर शुरू हो गए हैं। परियोजनाओं को मंजूरी देने में अनिर्णय की स्थिति खत्म हो गई है। आम और रेलवे बजट निवेश बढ़ाने वाले थे। पिछले 12 महीने में कोई घोटाला सामने नहीं आया है और देश में घोटालों का युग खत्म होने की हल्की-सी उम्मीद बंधी है। कोयले और स्पेक्ट्रम की नीलामी पारदर्शी रही। आवेदन और मंजूरी ऑनलाइन होने से घूसखोरी की गुंजाइश नहीं रही। और मोदी की व्यक्तिगत कूटनीति के कारण दुनिया में देश का रुतबा बढ़ा है। नेपाल- यमन में सक्रियता ताजे उदाहरण हैं।

इस ठोस रेकॉर्ड के बाद भी लोगों में असंतोष क्यों खदबदा रहा है? जब आप आर्थिक गिरावट से उबर रहे होते हैं तो नौकरियां लाने में वक्त तो लगता है। बाजार में मांग अब भी कमजोर है। कंपनियों के नतीजे अच्छे नहीं हैं। अर्थव्यवस्था के विस्तार का कोई कारण नहीं है और इसीलिए नौकरियों का परिदृश्य धूमिल है। खेती के लिए यह बुरा साल था और कमजोर मंत्री होने से स्थिति सुधारने में मदद नहीं मिली। निर्माण के क्षेत्र में धीरे-धीरे ही रोजगार लौटेगा, क्योंकि पिछली सरकार ने मंजूरी देने में जो अनिर्णय दिखाया उससे ढांचागत निर्माण में लगी कंपनियां चौपट हो गई थीं।

पिछली सरकार की निर्णयहीनता से तंग आकर तथा नरेंद्र मोदी का क्रियान्वयन कौशल देखकर लोगों ने उन्हें चुना। अब तक तो उन्होंने इसके पर्याप्त उदाहरण नहीं दिए हैं। हां, जनधन योजना अमल में लाने के स्तर पर सफल रही है। साल भर पहले तो किसी को कल्पना नहीं थी कि हर भारतीय परिवार कभी बैंक खाता होने की उम्मीद कर सकता है। अब आधार और मोबाइल फोन के माध्यम से गरीबों तक फायदे पहुंचाने के मामले में ऐतिहासिक बदलाव की पृष्ठभूमि तैयार हो गई है। इसके अलावा बैंक खातों से जुड़ी तीन योजनाएं शुरू की गई हैं। कम लागत पर दुर्घटना बीमा, जीवन-बीमा और वरिष्ठ नागरिकों के लिए पेंशन योजना। तीनों के प्रीमियम बहुत ही कम हैं। हालांकि, अमल में लाने के मामले में जन-धन योजना जैसे उदाहरण कुछ ही हैं। यदि ‘बिज़नेस करने में आसानी’ पर मोदी ने ध्यान केंद्रित किया होता तो अब तक कई सरकारी प्रक्रियागत अड़चनें दूर हो गई होतीं। अच्छे नेता क्रियान्वयन के ब्योरों में जाते हैं और यदि उन्होंने यह किया होता तो भाजपा शासित राज्यों में मीलों लंबा लालफीता कट चुका होता और ये राज्य ज्यादा प्रतिस्पर्द्धी और निवेश लायक हो चुके होते। इसी तरह यदि उनके पास नगर निगमों के साथ मिलकर काम करने वाली मजबूत क्रियान्वयन टीम होती तो स्वच्छ भारत अभियान अब तक दूसरों के लिए सफलता का मॉडल बन चुका होता।

शायद, ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’ देने में सबसे बड़ी नाकामी कर विभाग के कारण है। जहां मोदी निवेशकों को आकर्षित करने का प्रयास कर रहे हैं और वित्त मंत्री अरुण जेटली बिज़नेस अनुकूल माहौल बनाने का वादा कर रहे हैं, यह बात चौंकाने वाली है कि कर विभाग अब भी पिछली तारीख से वसूली में लगा है। विदेशी संस्थागत निवेशक ताजा मांग से इतने ख़फा हुए कि उन्होंने भारतीय शेयर बेचना शुरू कर दिए और शेयर बाजार धराशायी होने लगा। भारतीय करदाता के लिए भी जमीनी हकीकत यही है कि निर्दोष और ईमानदार करदाताओं को कर अधिकारियों की ओर से परेशान किया जाना जारी है। यही वजह है कि लोगों के दिमाग में परंपरागत नौकरशाही की छवि बनी हुई है।

राजनीति के मध्यमार्ग पर आकर मोदी ने लगता है हर किसी को नाराज कर दिया है। बिज़नेसमैन को लगता नहीं है कि वे वैसे व्यवसाय हितैषी रह गए हैं, जैसे वे गुजरात में थे। आर्थिक दक्षिणपंथी और महत्वाकांक्षी युवा पीढ़ी निराश हैं, क्योंकि वे ज्यादा साहसी सुधार लागू करके तेजी से नौकरियां नहीं लौटा पाए हैं। धर्मनिरेपेक्षवादी नाराज हैं कि वे अल्पसंख्यकों के प्रति दुर्भाग्यपूर्ण बयानबाजी रोकने के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर पाए हैं। संघ परिवार के उनके अपने समर्थक और सांस्कृतिक दक्षिणपंथी नाराज हैं कि उनका भगवा रंग धुंधला पड़ा है और ईसाई व मुस्लिम समुदाय के प्रति वे नरम रुख दिखा रहे हैं। विदेशी निवेशक तो ‘कर आतंकवाद’ से नाराज हैं ही। वामपंथियों को चिंता है कि गरीबों के हितैषी बनकर वे कहीं उनका मतदातावर्ग न झपट लें।

किंतु नरेंद्र मोदी की नज़र अगले आम चुनाव पर है। वे जानते हैं कि वोट तो राजनीतिक मध्यमार्ग पर चलने से ही मिलेंगे। मौजूदा अंसतोष तो खत्म हो जाएगा, क्योंकि अंतत: राजनीति व अर्थनीति का मिलन होना ही है। यद्यपि उनके सारे समर्थक आज उनसे नाराज हैं, मोदी व्यावहारिकता के मध्यमार्ग पर चलने की फसल चार साल बाद काटेंगे और 2019 के चुनाव जीतेंगे। कुल-मिलाकर प्रधानमंत्री ने वोटर के चुनाव को सही साबित किया है। राहुल गांधी या अरविंद केजरीवाल की तुलना में उन्होंने कहीं बेहतर प्रदर्शन किया है। मई 2014 में यही दो अन्य विकल्प भारतीय मतदाता के सामने थे। उनकी सरकार के पास काफी उपलब्धियां हैं, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि वे और भी बेहतर कर सकते थे यदि वे अपनी प्रमुख आर्थिक प्राथमिकताओं पर फोकस रखते और क्रियान्वयन पर कड़ी नज़र रखते।

Saturday, May 23, 2015

बेहतरी के बीच बेचैनी

राजनीति अल्पअवधि की चीज है, जबकि अर्थशास्त्र दीर्घकालिक। दोनों का झुकाव एक ही लक्ष्य की तरफ होता है, लेकिन तात्कालिक तौर पर दोनों विपरीत दिशा में काम करते हैं। इस बेमेल स्वभाव के कारण अधिकांश लोग निराश होते हैं।

अपनी सरकार की प्रथम वर्षगांठ पर यही बात प्रधानमंत्री मोदी के लिए समस्या भी है। हालांकि मोदी का रिकॉर्ड अच्छा है, लेकिन वह अपने समर्थकों की असाधारण अपेक्षाओं को नियंत्रित कर पाने में असफल रहे हैं। कुछ मुख्य प्राथमिकताओं को पूरा न कर पाने के कारण उनकी क्रियान्वयन क्षमता पर भी सवाल खड़े हुए हैं। संघ परिवार लगातार सरकार के समक्ष अड़चनें पैदा करता रहा है, लेकिन एक बड़े आश्चर्य की बात यही है कि मोदी अब व्यावहारिक हो चुके हैं और तीव्र व साहसिक सुधारों के बजाय क्रमिक आधुनिककर्ता के रूप में दिख रहे हैं। राजनीतिक मध्य मार्ग के प्रति झुकाव के कारण उन्होंने अपने अधिकांश समर्थक समूहों को नाखुश किया है।

एक वर्ष पहले की अपेक्षा अर्थव्यवस्था बेहतर हालत में है, लेकिन अभी भी यह अपनी वास्तविक क्षमता से दूर है। जीडीपी विकास में उल्लेखनीय प्रगति हुई है और अगले वर्ष तक भारत चीन को पछाड़कर दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बन जाएगा। महंगाई 18 महीने पहले की तुलना में इस समय आधी है। पिछले एक वर्ष से रुपया सर्वाधिक स्थिर मुद्रा है।

सरकारी वित्त की स्थिति बेहतर है। राजकोषीय और चालू खाते का घाटा नियंत्रण में है और 1991-92 की तुलना में पूंजी का प्रवाह सर्वाधिक है। बीमा और रक्षा क्षेत्र को अपेक्षाकृत उदार किया गया है और डीजल को विनियंत्रित कर दिया गया है। कोयला उत्पादन 8.3 फीसद बढ़ा है, जो पिछले 23 वर्षो में सर्वाधिक है। इससे कई बिजली संयत्रों को फिर से शुरू किया जा सका है। परियोजनाओं की स्वीकृति में व्याप्त अपंगता खत्म हुई है। आम बजट और रेलवे बजट, दोनों ही नए सिरे से निवेश उन्मुख हैं। पिछले 12 महीनों में घोटाले की एक भी घटना नहीं हुई है।

इससे उम्मीद जगी है कि भारत में बड़े घोटालों का समय खत्म हो गया है। पारदर्शी तरीके से कोयले और स्पेक्ट्रम की नीलामी हुई। ऑनलाइन आवेदन और स्वीकृतियां दी जा रही है, जिससे रिश्वतखोरी की संभावना कम होती है। आज दुनिया में भारत की साख और स्थिति बेहतर हुई है। व्यक्तिगत कूटनीति के लिए मोदी को धन्यवाद दिया जाना चाहिए। नेपाल और यमन में चलाए गए आपदा अभियान राहतकारी रहे हैं। इस ठोस रिकॉर्ड को देखते हुए आखिर कुछ लोग असहज क्यों हैं?

जब आप खस्ताहाल अर्थव्यवस्था के दौर से वापस निकलते हैं तो स्थिति को सुधारने में समय लगता है। उपभोक्ता मांग अभी भी कमजोर है, कंपनियों के परिणाम ज्यादा अच्छे नहीं हैं, जिस कारण रोजगार सृजन भी कमजोर है। कृषि के लिए यह एक खराब वर्ष रहा और एक कमजोर मंत्री मददगार साबित नहीं हुआ। विनिर्माण क्षेत्र में नौकरियों की गति धीमी रही, क्योंकि पिछली सरकार ने परियोजनाओं की स्वीकृति में देरी की, जिसके चलते इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियों की बैलेंस शीट खराब हो गई। इन कंपनियों को बड़ी मात्र में बैंकों को पैसे का भुगतान करना पड़ा जिससे वे दिवालिया हो गईं।

अपने पिछले बजट में सरकार ने कंपनियों की वित्तीय स्थिति में सुधार होने तक इन्फ्रास्ट्रक्चर में सीधे खर्च करने की बात कही थी। ऐसा होने के बावजूद रोजगार सृजन वापस पटरी पर लौटने में समय लगेगा। पिछली सरकार की नीतिगत अपंगता के चलते मतदाताओं ने मोदी की क्रियान्वयन क्षमता को देखते हुए उनका चुनाव किया था। हालांकि वह अभी इस दिशा में अपनी स्पष्ट छाप नहीं छोड़ सके हैं। हां, यह अवश्य है कि जनधन योजना बेहद सफल रही।

एक वर्ष पूर्व कोई कल्पना नहीं कर सकता था कि प्रत्येक भारतीय परिवार के पास एक बैंक खाता हो सकता है। आधार कार्ड और मोबाइल फोन की वजह से अब गरीबों को सीधे नकदी हस्तांतरण हो सकेगा। यह एक ऐतिहासिक बदलाव है। इससे सब्सिडी में धांधली को रोका जा सकेगा। जनधन बैंक खाते से जुड़ी तीन योजनाओं को घोषित किया गया है जिनमें से एक बहुत कम कीमत पर दुर्घटना बीमा की सुविधा है, दूसरी जीवन बीमा है और तीसरी वरिष्ठ नागरिकों के लिए पेंशन योजना है। इनके लिए बहुत कम वार्षिक प्रीमियम देना होगा। महज 12 रुपये में दो लाख की दुर्घटना बीमा योजना, 60 वर्ष की आयु पूरी होने पर पेंशन सुविधा का लाभ मिलेगा और 330 रुपये के वार्षिक प्रीमियम पर दो लाख रुपये की जीवन बीमा योजना सुविधा दी जाएगी।

यदि मोदी व्यापार में सहूलियत वाला माहौल बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं तो उन्हें नौकरशाही की तमाम अनावश्यक प्रक्रियाओं को खत्म करना होगा। लालफीताशाही को खत्म करने की दिशा में भाजपा शासित राज्यों को पहल करनी होगी और अधिक प्रतिस्पर्धी तथा निवेश उन्मुख होना होगा। इसी तरह स्वच्छता अभियान की दिशा में भी उन्हें दूसरों को प्रेरित करना होगा कि किस तरह नगर-कस्बों की सफाई की जाए। संभवत: मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेस में सबसे बड़ी विफलता टैक्स विभाग है।

जहां मोदी निवेशकों को प्रेरित-प्रोत्साहित कर रहे हैं, वित्तमंत्री अरुण जेटली पूर्वानुमान योग्य और गैर प्रतिकूल माहौल निर्मित करने की बात रहे हैं वहीं यह आश्चर्यजनक है कि कर विभाग रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स (पिछली तिथि से कर लागू करना) को लेकर अभी भी अडिग है। इससे विदेशी संस्थागत निवेशक अत्यधिक नाराज हैं और उन्होंने भारतीय शेयरों को बेचना शुरू कर दिया है, जिससे शेयर बाजार में तेज गिरावट की स्थिति बनी है। भारतीय करदाता भी परेशान हैं, क्योंकि निदरेष तथा ईमानदार करदाताओं को भी कर अधिकारी लगातार परेशान कर रहे हैं।

इससे भारतीय नौकरशाही के रवैये में कोई बदलाव नहीं होने की धारणा लोगों के मन-मस्तिष्क में बनी हुई है। 1व्यावसायियों का भी यह विश्वास टूटा है कि एक गुजराती होने के कारण वह व्यावसायिक माहौल के लिए प्रतिबद्ध हैं। आर्थिक समूहों के साथ आकांक्षी युवा भी साहसिक तरीके से बाजार सुधारों की दिशा में नहीं बढ़ने से निराश हैं, क्योंकि वह तेजी से रोजगार सृजन चाहते हैं। सेक्युलरवादी नाखुश हैं कि उन्होंने अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंदूवादी बयान देने वालों को रोकने के लिए कुछ विशेष नहीं किया। उनके अपने समर्थक और संघ परिवार नाखुश हैं कि वह ईसाइयों और मुस्लिमों के प्रति अधिक नरम हैं।

मोदी की नजर आगामी चुनावों पर है। वह जानते हैं कि वर्तमान असंतोष गुजर जाएगा, क्योंकि राजनीति और अर्थशास्त्र अंत में मिल जाते हैं। कुल मिलाकर प्रधानमंत्री मोदी ने राहुल गांधी अथवा केजरीवाल से बेहतर प्रदर्शन किया है, जो मई 2014 में भारतीय मतदाताओं के समक्ष दो अन्य विकल्प थे। साख की दृष्टि से उनकी सरकार ने बेहतर सफलता हासिल की है, लेकिन निश्चित रूप से यदि वह मुख्य आर्थिक प्राथमिकताओं पर केंद्रित रहते तो और अधिक बेहतर कर सकते थे।

Sunday, May 17, 2015

One-year itch: Modi shift to political centre angers both right and left

Politics is a short game while economics is a long one. Both tend to converge in the end but in the interim they pull in opposite directions. Because of this mismatch, most of the people are invariably disappointed. This is Prime Minister Modi’s problem on the first anniversary of his government. Although his record is reasonably good, he has neither met the extraordinary expectations of his supporters nor followed through on key priorities. Surprisingly, he has turned out to be a pragmatic gradualist — by shifting towards the political centre, he has left all his constituencies unsatisfied.

The economy is in far better shape than a year ago, although nowhere near its full potential. GDP growth has turned around and India is set to surpass China next year to become the world’s fastest growing major economy. Inflation is down. Government finances are healthy — both fiscal and current account deficits are under control — and capital inflows have been the highest since ’91-92. Insurance and defence sectors have been liberalized and diesel decontrolled. Coal production has grown 8.3%, the highest in 23 years, allowing many power plants to restart. The paralysis afflicting project approvals is over. Both the general and railway budgets were refreshingly investment oriented.

There has been no corruption scandal in the past 12 months, raising the hope that the age of grand larceny may be over. Auctions for coal and spectrum were transparent. Applications and approvals are moving online where there is less scope for bribery. In addition, India’s standing in the world has improved thanks to Modi’s personal diplomacy, and recent actions to alleviate distress in Nepal and Yemen have reinforced this new stature.

Given this fair record, why is discontent brewing? When you are coming out of such a low economic ditch, it takes time for jobs to come back. When consumer demand is still weak, company results are poor; the producer is shy of investing and jobs prospects are bleak. It’s also been a bad year for agriculture and a weak minister hasn’t helped. Construction jobs are slow to come back because balance sheets of infrastructure companies were destroyed by approval paralysis of the past government.

Frustrated by that paralysis, voters brought in Modi because of his ability to act. But he has not given enough evidence of his execution skills. Yes, the Jan Dhan Yojana is a success. A year ago, no one imagined that every Indian family could aspire to a bank account. This is precisely what is happening. The stage is now set for a historic change in benefits delivery to the poor via cash transfers through Aadhar identity and mobile phones, which will cut subsidy fraud dramatically.

There are not enough implementation successes, however. Good leaders get into the messy details of execution. If Modi had focused on executing his ‘ease of doing business’ project, more bureaucratic processes would have been eliminated by now and the BJP-ruled states at least would have cut miles of red tape and become more competitive. Similarly, stronger implementation with municipalities by the Swachch Bharat Mission could have created some real models of success by now about how to clean up a town.

Perhaps, the biggest failure in the delivery of ‘minimum government, maximum governance’ is the tax department. While Modi has been wooing investors and FM Jaitley promising to create a predictable, non-adversarial environment, the tax department shockingly persists with unfair retrospective demands. The reality on the ground is that the innocent taxpayer continues to be harassed by tax officials. Hence, the image of an unreformed bureaucracy persists.

By moving towards the political centre, Modi seems to have displeased everyone. Businessmen think he is no longer as pro-business as he was in Gujarat. The cultural right is upset that he has turned out to be less sectarian, and even soft on Christians and Muslims. The economic right is disappointed that he has not implemented market reforms more boldly. His enemies on the left find that he has turned pro-poor, and stolen their fire. But with his eyes on 2019, he knows in his heart that votes reside in the political centre and he will win in the long run. The present discontent will also pass because politics and economics will converge in the end.

Sunday, April 19, 2015

Ten steps that can put the railways back on track

Once upon a time we used to proudly call Indian Railways the ‘nation’s lifeline’. Today, we are embarrassed by it. Every Indian had an impossibly romantic railway memory. Today these memories have faded as successive politicians have played havoc with a grand old institution. The root problem is that railways is a state monopoly, starved by politics of investment and technology, and prevented by a pernicious departmental structure from becoming a modern, vibrant enterprise. As a result, it is hard to get a ticket as capacity is short; service is shoddy, callous and unsafe, despite the railways being hopelessly over-manned.

Indian Railways remains one of the last state railway monopolies. Almost all democratic countries have broken their monopolies, and with spectacular results, disproving the old myth that the railway is a natural monopoly. Indians, too, have learned since 1991 that monopolies are bad. Before their eyes competition has created a telecom revolution. Who would have imagined that even the poorest would have a phone — India now has 99 crore telephones compared to 50 lakh in 1990. Competition has lowered prices, improved services, engendered innovation, and diminished corruption. Similar benefits have accrued in breaking other monopolies — for example, of Air India/Indian Airlines in air travel and Doordarshan in television.

Fortunately, there is real hope for the railways. Prime Minister Modi is determined to modernize it, and he has in Suresh Prabhu a capable, dynamic railway minister. What needs to be done is also clear from a series of expert committees, the latest being the Bibek Debroy committee, which has posted its interim report online on March 31 for comments from the public. Based on lessons learned from the reform of other railways and the world’s best practices, here are ten steps to restore the glory of a great institution.

One, create distance between the owner and the manager, as in all professional enterprises. The owner, in this case the ministry, should only lay down policy for the rail sector and give operating autonomy to those who run trains. Two, unbundle Indian Railways into two organizations — one responsible for the track and infrastructure and another to operate trains in competition with others. Each will have its own board with independent and executive directors. Three, establish an umpire or regulator to ensure fair and open access to the track, set access charges, establish tariffs, and ensure safety. Four, open up both freight and passenger trains to competition with Indian Railways. An independent regulator and track organization are essential to attract private competition.

Five, to be competitive, Indian Railways must focus only on core activity of running trains and divest all peripheral activities — running schools, hospitals, police forces, printing presses, bottling water — which fritter away resources and distract employees. Six, grant autonomy to production and construction units so that they can independently raise capital from the market and compete for business from railway companies in India and abroad. Seven, give general and divisional managers greater autonomy and accountability in all functions, including tendering, procurement, and finance.

Eight, move to modern, commercial accounting for better decision-making and raising funds from investors. Today, it is impossible to assess real profitability or real return on investment. Nine, let suburban and local passenger services which lose money be run as joint ventures with state governments, who must bear the cost of subsidy in the spirit of cooperative federalism. Ten, leverage land banks, airspace above stations, and other assets to raise capital with the help of investment banks to become a healthy, commercial enterprise.

In the ideal world, governments should govern and not run businesses. But given political realities, it is sensible not to privatize but create competition within the rail sector. Competition will lead to better, cleaner, safer services and happier customers. It will mean more motivated, accountable railway employees, insulated from politicians, and whose bonuses are linked to profitability, while pensions are protected by the state. And the nation will be saved the incalculable cost of transport shortages. The ball is now in Prabhu’s court. If there is anyone who can implement these ten steps, it is he.