Tuesday, February 03, 2015
हिंदुत्व नहीं, नौकरियां लाएं मोदी
Sunday, January 25, 2015
Dharma vs desire, therein hangs a morality tale
Monday, December 29, 2014
संस्कृत पर अधूरी बहस
दरअसल मध्य वर्ग इस विषय की पढ़ाई करके नौकरी को लेकर खुद को असुरक्षित महसूस करता है। इसका एक कारण यह भी है कि संस्कृत विषय को खुले तौर पर, जिज्ञासु रूप में और विश्लेषणात्मक मानसिकता से नहीं पढ़ाया जाता। आज संस्कृत के विद्वानों में आजादी के पूर्व की पीढ़ी का कोई ऐसा उत्ताराधिकारी नहीं है जो इस विषय का विशिष्ट ज्ञान रखता हो और वह अंतरराष्ट्रीय जिज्ञासुओं के लिए कुछ लिखने-बताने की क्षमता रखता हो। प्राचीन ज्ञान की महान परंपरा भी अब खतरे में पड़ती दिख रही है।
वर्तमान विवाद में हमारे स्कूलों में संस्कृत की शिक्षा को लेकर कोई बहस नहीं हो रही है, जो अनिवार्य रूप से होनी चाहिए। शिक्षा का प्राथमिक उद्देश्य यह नहीं है कि किसी भाषा को पढ़ाया जाए अथवा कुछ तथ्यों को रटाया जाए, बल्कि इसका उद्देश्य विचार की क्षमता को बढ़ाना, प्रश्न करना, विषयों की व्याख्या करना और हमारी बोध क्षमताओं को विकसित करना है। इसका दूसरा उद्देश्य प्रेरणा भरना और युवाओं में मूल्यों का विकास है। केवल एक लगनशील व्यक्ति ही कुछ भी हासिल करने की क्षमता रखता है। ऐसा व्यक्ति ही अपनी पूर्ण मानवीय क्षमताओं को समझ सकता है और उन्हें हासिल कर सकता है। इन दोनों ही लक्ष्यों को हासिल करने के लिए हमें लगनशील अध्यापकों की जरूरत है और यही कमी भारतीय शिक्षा की समस्याओं की मूल जड़ है। तमाम अभिभावकों और छात्रों का मानना है कि शिक्षा केवल जीने का एक जरिया है, जबकि वास्तविकता यह है कि यह हमारे जीवन को बनाती है अथवा उसे आकार देती है। निश्चित ही बाद में शिक्षा हमारे कॅरियर को भी बनाती है, लेकिन शुरुआती शिक्षा हममें खुद अपने बारे में विचार करने, कल्पना करने और सपने देखने का आत्मविश्वास भरती है। संस्कृत की उपयुक्त शिक्षा हममें आत्मबोध और मानवीयता की भावना का विकास करती है, जैसा कि लैटिन और ग्रीक की पढ़ाई ने पीढ़ी दर पीढ़ी यूरोपीय लोगों के लिए किया है। वे अपनी जड़ों को पुराने रोम और यूनान में पाते हैं। यह उन लोगों के लिए एक उत्तर है जो पूछते हैं कि आखिर क्यों हम संस्कृत जैसी एक कठिन भाषा की पढ़ाई पर खर्च करें, जबकि हम इकोनामिक्स और कॉमर्स जैसे विषयों की पढ़ाई से अपने जीवन की संभावनाओं को बेहतर बना सकते हैं? वास्तव में संस्कृत भी यह काम कर सकती है और किसी के लिए भी अवसरों को बढ़ा सकती है। इस भाषा के व्याकरण नियमों को सीखने के लिए की गई कठिन मेहनत हमें अपने विचारों को गढ़ने और उन्हें अभिव्यक्त करने की क्षमता दे सकती है। स्कूलों में त्रिभाषा फार्मूले के तहत संस्कृत का अध्ययन विफल रहा। बेहतर अध्यापकों की कमी और खराब पाठ्यक्रम के कारण यह युवाओं का ध्यान आकर्षित नहीं कर पाई। पौराणिक कामिक बुक्स जैसे कि अमर चित्रकथा और संस्कृत में टीवी कार्टूनों के माध्यम से बच्चों में संस्कृत के प्रति रुचि जगाई जा सकती है। संस्कृत को लेकर मीडिया में चल रही बहस के मुताबिक स्कूलों में संस्कृत की शिक्षा अनिवार्य करना गलत है। संस्कृत को रटाने और इसे अनिवार्य बनाने के बजाय इसकी बेहतर शिक्षा पर जोर दिया जाना चाहिए।
वर्तमान बहस में दोनों ही पक्षों में गंभीरता का अभाव दिखता है, जो केवल अज्ञानता और उन्माद पर आधारित हैं। हिंदुत्ववादियों और सेक्युलरवादियों दोनों को ही समझना चाहिए कि आखिर क्यों आधुनिक युवा संस्कृत से दूर हैं? प्राचीन भारत में हवाई जहाज, स्टेम सेल शोध और प्लास्टिक सर्जरी के आडंबरपूर्ण दावों के कारण संस्कृत की वास्तविक उपलब्धियों और इसकी विश्वसनीयता की उपेक्षा हुई है। उदाहरण के लिए गणितीय दशमलव पद्धति को लिया जा सकता है। हिंदुत्ववादी पक्ष में खुलेपन का अभाव है, जबकि हमारे पूर्वज साहित्य, दर्शन, नाट्य रचना, विज्ञान और गणित को लेकर बहुत ही रचनात्मक और खुले विचारों वाले थे। राष्ट्रवादियों के इन नारों कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है अथवा भगवद्गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित किया जाना चाहिए, ने लोगों को निराश किया है, क्योंकि ऐसा करके भारत को पाकिस्तान के साथ खड़ा किया जा रहा है। दूसरी तरफ वामपंथी चाहे वे मार्क्सवादी हों, नारीवादी हों या पर्यावरणवादी, भी इतिहास को वर्ग, जाति और लैंगिक संघर्ष के संदर्भ में देखने के दोषी हैं। वे उत्तर उपनिवेशवादी इतिहास को औपनिवेशिक दमन के नजरिये से देखते हैं। 18वीं और 19वीं शताब्दी में संस्कृत के प्रति पश्चिमी विद्वानों का योगदान अमूल्य है। उन्होंने ही प्राचीन पांडुलिपियों के गूढ़ रहस्यों को बताया और अतीत के दरवाजों को खोला।
हमें भारत में संस्कृत के भविष्य की परवाह इसलिए करनी चाहिए ताकि हमारे बच्चे अच्छा जीवन व्यतीत कर सकें। इससे कुछ सर्वाधिक आधारभूत प्रश्नों का जवाब हासिल किया जा सकता है जैसे कि जीवन का क्या अर्थ है? इतिहास के ज्ञान से हम अधिक परिपक्व और आत्मविश्वासी व्यक्ति बनते हैं। यदि हम पिछले 3000 वर्षों के ब्यौरों को पढ़ने की योग्यता खो देंगे तो मानव जीवन के लिए जरूरी कुछ अनिवार्य और आधारभूत चीजों को भी खो देंगे। संस्कृत को पुनर्जीवित करते समय हमें अनिवार्य रूप से इसे धर्म से अलग करना चाहिए। यह राजनीतिक कार्यक्रम न होकर, सभी चिंतनशील भारतीयों की चिंता होनी चाहिए। संस्कृत को पुनर्जीवित करने को लेकर ताजा विवाद अच्छी बात होगी यदि भारत में संस्कृत को पढ़ाने और इसे सीखने की गुणवत्ता में इजाफा हो।
Tuesday, December 16, 2014
धारावी से प्रेरणा लेकर शहर बनाएं
नेहरू के समय से ही शहरों के लिए कुलीनवादी मास्टर प्लान बनाने का फैशन था। इसमें जमीन, पूंजी और पानी की भारी बर्बादी होती और इसमें भारतीय हजारों वर्षों से जिस तरह रह रहे हैं, उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है। ये सख्त मास्टर प्लान कामकाजी और रहने की जगहों को अलग करने के उच्च वर्ग के विचार पर आधारित होते हैं। यह बहुत विनाशक तरीके से कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में व्यक्त हुआ, जिसने दिल्ली के लाखों गरीबों की आजीविका खत्म कर दी।
इसी मानसिकता ने नेहरू को पंजाब व हरियाणा की राजधानी के रूप में चंडीगढ़ स्थापित करने को प्रेरित किया, जिसमें कई एकड़ आकर्षक ग्रीन बेल्ट मौजूद है। चंडीगढ़ मुख्यत: नौकरशाहों के लिए हैं और आम आदमी की आजीविका के विरुद्ध है। अब मोदी ने हमारी शब्दावली में ‘स्मार्ट सिटी’ जुमला और ला दिया है। मैं समझता हूं कि यह पर्यावरण के अनुकूल, टेक्नोलॉजी से एकीकृत और समझदारी से नियोजित शहर है, जिसका जोर सूचना प्रौद्योगिकी के जरिये शहरी मुश्किलें दूर करने पर है।
किंतु शहर तब तक ‘स्मार्ट’ नहीं हो सकता जब तक यह आम आदमी की आजीविका को केंद्र में रखकर डिजाइन नहीं किया जाता। इसके लिए मानवीय दृष्टिकोण से हमारे शहरी गरीबों और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को केंद्र में रखकर सोचना चाहिए। हमें हरे-भरे चंडीगढ़ से नहीं, मुंबई की कुख्यात झुग्गी बस्ती धारावी से प्रेरणा लेनी चाहिए। यह हमें बताती है कि जब गांवों के लोग आजीविका की तलाश में शहरों में आते हैं और काम की जगह के पास ही रहने की जगह खोज लेते हैं तो किस प्रकार शहर का संगठित रूप से विकास होता है।
उनकी जरूरतें पूरी करने के लिए किराना, हेयर कटिंग सैलून, साइकिल रिपेयर और मोबाइल फोन रिचार्जिंग की दुकानें पैदा हो जाती हैं। धारावी की ताकत सड़कों पर दिखाई देने वाली सामाजिकता है, जहां अजनबियों के साथ परस्पर निर्भरता के रिश्ते बन जाते हैं। सड़कों की यह जिंदगी हर भारतीय शहर के लिए महत्वूपूर्ण है। यह अमेरिका में 1950 के बाद से गायब हो गई, जब ऑटोमोबाइल के विकास के साथ लोग उपनगरों में रहने चले गए। दुर्भाग्य से बड़ी संख्या में भारतीय इस अमेरिकी उपनगरीय जीवन-शैली से अभिभूत हैं। नतीजा यह है कि कई शहरी नियामक संस्थाएं जमीन के मिश्रित उपयोग की अनुमति नहीं देतीं कि एक ही कॉलोनी में कामकाजी और रहवासी दोनों क्षेत्रों का साथ में अस्तित्व हो।
कई बहुमंजिला इमारतों को इजाजत नहीं देते। ऐसे देश में यह बेतुका है, जहां जमीन की कमी हो। जिस देश में लोग पैदल चलते हों और साइकिल की सवारी करते हों, वहां सड़क बनाते समय सबसे पहले फुटपाथ और साइकिल पथ के बारे में सोचा जाना चाहिए। इसकी बजाय हमारी कुलीनवादी मानसिकता हजार छात्रों के लिए सैकड़ों एकड़ क्षेत्र वाली यूनिवर्सिटी बनाने की अनुमति देती है, जबकि समझदारी तो इसके लिए शहर के मध्य में बहुमंजिला इमारत बनाने में होती। वहां छात्र जनता का हिस्सा होते और रोज लोगों से उनका संपर्क रहता।
स्मार्ट सिटी को शासन और आर्थिक मामलों में स्वायत्त होना जरूरी है। आज भारतीय शहर राज्य सरकारों की दया पर निर्भर हैं। इसके लिए 74वां संविधान संशोधन लाया गया था, लेकिन राज्यों ने इसमें अड़ंगा डाल दिया। जब तक लोगों के प्रति जवाबदेह मेयर नहीं होगा, सेवाओं में सुधार भी नहीं होगा। म्यूनिसिपल कमिश्नर मुख्यमंत्री के नहीं, मेयर के मातहत होना चाहिए। पैसा जुटाने के इसके अपने संसाधन होने चाहिए। वह टैक्स के अलावा दी जा रही सेवाओं के बदले तर्कसंगत शुल्क वसूल करे। राजस्व बंटवारे के तहत राज्य के साथ ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि पहले से ही पता हो कि कितना पैसा मिलने वाला है। दुनिया के कई शहरों की तरह इसे म्यूनिसिपल बांड जारी करने की अनुमति होनी चाहिए। मोदी को श्रेय दिया जाना चाहिए कि वे शहरों को पुनर्जीवित करने को केंद्र के एजेंडे में ले आए।
उन्हें जल्दबाजी न कर, सावधानी से कार्यक्रम विकसित करना चाहिए। जब वे स्मार्ट सिटी का कार्यक्रम लाएंगे तो लोग उन पर शोशेबाजी या नई बोतल में पुरानी शराब का आरोप लगाएंगे। एक अर्थ में यह सही भी है, क्योंकि यह विचार पुरानी सरकार के जेएनएनयूआरएम का हिस्सा रहा है। किंतु 20 साल बाद आप क्या याद रखेंगे, जेएनएनयूआरएम या स्मार्ट सिटी? बेशक, यह ऐसा नाम है, जो लोगों को इसके लिए एकजुट करेगा। कामना है कि यह वाकई ऐसा कार्यक्रम साबित हो, जो भारत के भविष्य को रूपांतरित कर दे।
Sunday, December 14, 2014
Sanskrit, taught well, can be as rewarding as economics
Now I feel that each blade has its unique spot on the earth from where it draws its life and strength. So is a man rooted to a land from where he derives his life and his faith. Discovering one’s past helps to nourish those roots, instilling a quiet self-confidence as one travels through life. Losing that memory risks losing a sense of the self.
With this conviction I decided to read Sanskrit a few years ago. I knew a little from college but now I wanted to read the Mahabharata. Mine was not a religious or political project but a literary one. But I did not want to escape to ‘the wonder that was India’. I wanted to approach the text with full consciousness of the present, making it relevant to my life. I searched for a pundit or a shastri but none shared my desire to ‘interrogate’ the text so that it would speak to me. Thus, I ended up at the University of Chicago.
I had to go abroad to study Sanskrit because it is too often a soul-killing experience in India. Although we have dozens of Sanskrit university departments, our better students do not become Sanskrit teachers. Partly it is middle-class insecurities over jobs, but Sanskrit is not taught with an open, enquiring, analytical mind. According to the renowned Sanskritist, Sheldon Pollock, India had at Independence a wealth of world-class scholars such as Hiriyanna, Kane, Radhakrishnan, Sukthankar, and more. Today we have none.
The current controversy about teaching Sanskrit in our schools is not the debate we should be having. The primary purpose of education is not to teach a language or pump facts into us but to foster our ability to think — to question, interpret and develop our cognitive capabilities. A second reason is to inspire and instill passion. Only a passionate person achieves anything in life and realizes the full human potential. And this needs passionate teachers, which is at the heart of the problem.
Too many believe that education is only about ‘making a living’ when, in fact, it is also about ‘making a life.’ Yes, later education should prepare one for a career, but early education should instill the self-confidence to think for ourselves, to imagine and dream about something we absolutely must do in life. A proper teaching of Sanskrit can help in fostering a sense of self-assuredness and humanity, much in the way that reading Latin and Greek did for generations of Europeans when they searched for their roots in classical Rome and Greece.
This is the answer to the bright young person who asks, ‘Why should I invest in learning a difficult language like Sanskrit when I could enhance my life chances by studying economics or commerce?’ Sanskrit can, in fact, boost one’s life chances. A rigorous training in Panini’s grammar rules can reward us with the ability to formulate and express ideas that are uncommon in our languages of everyday life. Its literature opens up ‘another human consciousness and another way to be human’, according to Pollock.
Teaching Sanskrit under the ‘three-language formula’ has failed because of poor teachers and curriculum. Mythological comic books such as Amar Chitra Katha and TV cartoons in Sanskrit with captions might at least catch the imagination of children. But the debate is also about choice. Those who would make teaching Sanskrit compulsory in school are wrong. We should foster excellence in Sanskrit teaching rather than shove it down children’s throats.
The lack of civility in the present debate is only matched by ignorance and zealotry on both sides. The Hindu right makes grandiose claims about airplanes and stem cell research in ancient India and this undermines the real achievements of Sanskrit. The anti-brahmin, Marxist, post-colonial attack reduces the genuine achievements of Orientalist scholars to ‘false consciousness’. Those who defend Sanskrit lack the open-mindedness that led, ironically, to the great burst of creative works by their ancestors. In the end, the present controversy might be a good thing if it helps to foster excellence in teaching Sanskrit in India.
Saturday, November 22, 2014
मुक्त बाजार का मंत्र
राजनीतिक तौर पर निर्धारित की गई कीमतें उत्पादकों को उनकी लागत निकालने की अनुमति नहीं देती थीं, जिससे अभाव की स्थिति बनी रहती थी और कालाबाजारी को बढ़ावा मिलता था। मुझे अभी भी याद है कि मेरा पारिवारिक घर वर्षों तक अधूरा रहा, क्योंकि मेरे पिता सीमेंट की कुछ अतिरिक्त बोरियों के लिए रिश्वत देने को तैयार नहीं हुए। इस राजनीतिक मूल्य व्यवस्था के कारण 1989 में शक्तिशाली सोवियत संघ भी ढह गया। कम्युनिस्ट सरकार का सभी फैक्टियों और उत्पादन के अन्य साधनों पर स्वामित्व था। क्या उत्पादन किया जाना है, कितना उत्पादन होना है और कीमतें क्या होंगी, यह सभी कुछ सोवियत संघ के नौकरशाह तय करते थे, न कि बाजार। इसने लोगों को बर्बाद करने का काम किया। रूस की दुर्गति को देखते हुए दुनिया ने यही सीखा कि सरकार का काम बिजनेस नहीं है और उसे वृहद आर्थिक नीतियों के मामले में न्यूनतम हस्तक्षेप करना चाहिए। भ्रष्टाचार कीमतों में हेरफेर का अनिवार्य परिणाम है। इसके कारण डीजल में केरोसिन की मिलावट को बढ़ावा मिला। इस बारे में पूर्व सरकारी तेल समन्वय समिति ने एक चौंकाने वाला आंकड़े पेश करते हुए तकरीबन 40,000 करोड़ रुपये के घोटाले का अनुमान व्यक्त किया। जांच में यह बात भी सामने आई कि इस रैकेट का खुलासा करने वाले तमाम मुखबिरों को मौत के घाट उतार दिया गया। खाद्य कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से लोगों को एक रुपये प्रति किलो अनाज मुहैया कराने के लिए राष्ट्र को वास्तव में 3.65 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि आधा अनाज खराब हो जाता है, जिससे राष्ट्र को प्रति वर्ष 50,000 करोड़ रुपये का नुकसान होता है।
बिजली के मामले में भी चोरी कीमत नियंत्रण का स्वाभाविक परिणाम है। इससे राज्य बिजली बोर्डों को वित्तीय नुकसान होता है। रेलवे को दूसरी श्रेणी के प्रति टिकट पर हर किलोमीटर के हिसाब से 24 पैसे का नुकसान होता है। यह तब है जबकि कुछ महीने पहले ही रेल किरायों में 15 फीसद की बढ़ोतरी की गई है। रेलवे को यात्री किराये से 26000 करोड़ रुपये का नुकसान होता है। यात्री किराये में होने वाले घाटे की भरपाई मॉल भाड़े में बढ़ोतरी से की जाती है। यही मुख्य वजह है जिस कारण भारतीय रेल अपना आधुनिकीकरण नहीं कर पा रही है और शेष दुनिया की तुलना में भारत पीछे है। मोदी लोगों को समझाएं कि एक दक्ष और भ्रष्टाचारमुक्त अर्थव्यवस्था राजनेताओं को कीमतें निर्धारित करने की अनुमति नहीं देती। इससे उन्हें लोगों को यह समझाने में भी मदद मिलेगी कि जन धन योजना वाले खातों में नकदी धन हस्तांतरण बेहतर है और इस तरह गैस सिलेंडरों पर मिलने वाली सब्सिडी, पीडीएस खाद्यान्न और बिजली आदि के लिए चलाई जा रही योजनाओं में भ्रष्टाचार घटेगा।
भ्रष्टाचार रोकने के मामले में लोकपाल के बजाय बाजार अधिक बेहतर काम कर सकता है। इस बात को अरविंद केजरीवाल और अन्ना हजारे नहीं समझ सके। डीजल की कीमतों को विनियंत्रित करने के कुछ सप्ताह बाद ही सरकार ने कोयला खनन के लिए प्रतिस्पर्धी निविदा की घोषणा की। यह एक अच्छा निर्णय है। यह खुली निविदा उन्हीं तक सीमित है जो कोयले का उपयोग करते हैं, जैसे कि बिजली कंपनियां। इससे राज्यों को कई गुना अधिक राजस्व अर्जित होगा और कोयला बाजार अधिक प्रतिस्पर्धी होगा। इससे कोल इंडिया का एकाधिकार खत्म होगा, जो कि एक प्रमुख समस्या बन चुका है। एयरलाइंस, टेलीफोन और टेलीविजन में प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने की जरूरत है ताकि विकल्पों की उपलब्धता बढ़े और अधिक स्वतंत्रता कायम हो। एक अन्य हास्यास्पद बात यह है कि भारतीय सोचते हैं कि वे अपने गौरवमयी लोकतंत्र के कारण आजाद हैं, लेकिन आर्थिक तौर पर वे अभी भी पराधीन हैं। मोदी बार-बार कहते हैं कि सरकार का काम बिजनेस नहीं शासन संचालन है, लेकिन वह अपने कड़े निर्णयों का प्रचार नहीं कर सकते, जो आगामी कुछ महीनों में अवश्यंभावी हैं। उन्हें समझना होगा कि सब्सिडी, मूल्य नियंत्रण और सरकारी एकाधिकार से विकृति पैदा हो रही है और इससे जरूरतमंद आम लोगों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। बाजार प्रतिस्पर्धा से कीमतें नियंत्रित होंगी, उत्पादों की गुणवत्ता बेहतर होगी और आम आदमी की आजादी बढ़ेगी। दुनिया भर में उपलब्ध साक्ष्य बताते हैं कि बिजनेस करने की स्वतंत्रता का उल्टा संबंध भ्रष्टाचार सूचकांक से है। इसका आशय यही है कि सर्वाधिक भ्रष्ट देश वह हैं जहां सरकारें बिजनेस पर नियंत्रण रखती हैं अथवा बाजार पर उनका बहुत अधिक हस्तक्षेप है। 2011 में दुनिया के 10 में से 7 सबसे कम भ्रष्ट देश बिजनेस फ्रीडम वाले देशों की सूची में शीर्ष 10 में शामिल थे। इनमें न्यूजीलैंड, सिंगापुर, डेनमार्क, कनाडा, स्वीडन और फिनलैंड शामिल हैं। 10 सर्वाधिक भ्रष्ट देश इस सूची में सबसे निचले पायदान पर हैं। भारत को इसमें बहुत ही खराब 167वां स्थान मिला और भ्रष्टाचार सूचकांक में भी भारत 95वें स्थान पर है।
स्कैंडिनेवियाई देशों जहां से भारत ने लोकपाल की धारणा ली है, में सर्वाधिक बिजनेस स्वतंत्रता है और वे सबसे कम भ्रष्ट हैं। बावजूद इसके भारतीय सोचते हैं कि वे अपने गौरवपूर्ण लोकतंत्र के कारण आजाद हैं। अंत में प्रधानमंत्री मोदी का आकलन रोजगार निर्माण, महंगाई पर नियंत्रण और भ्रष्टाचार पर रोक लगाने से होगा। बाजार व्यवस्था पूर्ण नहीं है, लेकिन किसी भी अन्य विकल्प से बेहतर है। यदि मोदी हमारी राजनीतिक अर्थव्यवस्था को बदलने में कामयाब हुए तो अभिलाषी भारत समाजवादी पाखंड की छाया से अंतत: मुक्त हो सकेगा और बाजारवादी व्यवस्था पर भरोसे की शुरुआत होगी।
Sunday, November 02, 2014
Can our best salesman sell us the free market?
Thursday, October 23, 2014
स्वच्छता की नींव पर राष्ट्र निर्माण
नागरिकता बोध मानव में प्राकृतिक रूप से नहीं आता। इसे लगातार याद दिलाना जरूरी होता है तथा भारत से ज्यादा कहीं और इसकी जरूरत नहीं है, जो अब भी अपने यहां नागरिक निर्मित करने के लिए संघर्ष कर रहा है।
नागरिकता के ख्याल से प्रेरित नागरिक हमेशा पड़ोसियों के बारे में सोचता है फिर चाहे उनकी जाति या वंश कुछ भी क्यों न हो। ऐसे व्यक्ति को ‘लव जेहाद’ जैसे अभियानों से चोट पहुंचती है, जिसके कारण भाजपा ने उत्तरप्रदेश के हाल के उपचुनावों में 11 सीटों में से 8 सीटें खो दीं, जो उचित ही था। मोदी के आधुनिकीकरण के विचार और आरएसएस के बीच विभाजन पैदा हो रहा है। यह ठीक वैसा ही है, जैसा वाजपेयी व आरएसएस के बीच था। मैं शर्त लगा सकता हूं कि अंत में जीत प्रधानमंत्री की ही होगी।
आधुनिकीकरण की इस परियोजना में मोदी को टेक्नोलॉजी के कारण सफलता की उम्मीद है, जिसमें महात्मा गांधी और पूर्ववर्ती सरकारें विफल रहीं हैं। उन्हें लगता है कि देशभर में स्वच्छता, देशभर में वाई-फाई जैसी बात है। वे कहते हैं कि विकास सिर्फ वृद्धि दर की बात नहीं है पर साथ में वे लोगों के जीवन में गुणवत्ता लाने की बात भी करते हैं और साफ-सुथरा वातावरण इस दिशा में मददगार है। अब नगर पालिकाओं के सामने कम लागत वाली टेक्नोलॉजी उपलब्ध है, लेकिन वे तब सफल होंगी जब हमारे नागरिक प्रयास करेंगे और इसीलिए हमारे प्रधानमंत्री लोगों का नज़रिया बदलने का प्रयास कर रहे हैं।
मोदी सिंगापुर के महान नेता ली कुआन यू का अनुसरण कर रहे हैं, जिन्होंने यह साबित किया कि स्वच्छता के नैतिक मूल्य पर राष्ट्र निर्माण संभव है। हालांकि, यदि भारत को इस अभियान का शोर व जोर ठंडा होने के बाद भी स्वच्छ रहना है तो मोदी को भी वही करना होगा, जो सिंगापुर ने किया। उन्हें कचरा फैलाने के खिलाफ सख्त कानून बनाने होंगे। आरोग्य व लोक स्वास्थ्य पर सतत निवेश जरूरी होगा और यह पैसा सही जगह खर्च होगा।
यदि किसी एक शब्द से भारत के शहरों व कस्बों को वर्णित किया जाए तो वह शब्द है गंदगी। हममें से कई लोग यह सोचते हैं कि गरीबी व गंदगी का चोली-दामन का साथ है, लेकिन बात ऐसी नहीं है। कोई गरीब होकर भी साफ-सुथरा हो सकता है। भारत में सबसे गरीब घर में प्राय: सबसे स्वच्छ रसोईघर होते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जापान गरीब हो गया था, लेकिन इसके शहर अत्यधिक स्वच्छ थे। वास्तव में पूर्वी एशिया हमेशा से ही दक्षिण एशिया की तुलना में अधिक स्वच्छ रहा है। भारत में भी उत्तर की तुलना में दक्षिण भारतीय समुदाय अधिक स्वच्छ हैं (तब भी जब वे तुलनात्मक रूप से ज्यादा गरीब थे।)
महात्मा गांधी का भी विश्वास था कि नागरिक मूल्य और स्वच्छता राष्ट्रवाद की नींव हैं। लाहौर के प्रसिद्ध कांग्रेस अधिवेशन में वे पूर्ण स्वराज्य की बजाय कांग्रेस प्रतिनिधियों की गंदगी फैलाने की आदतों पर अंतहीन बोलते रहे। जब लोगों ने उनसे पूछा कि उन्होंने स्वराज पर उत्तेजनापूर्ण भाषण क्यों नहीं दिया, तो उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता पाने के लिए व्यक्ति को इसके लायक बनना होता है और योग्य बनने के लिए भारतीयों को व्यक्तिगत अनुशासन और साफ-सफाई के मामले में सुधार लाना होगा। मोदी की तरह गांधी का भरोसा था कि नागरिक दायित्व और स्वच्छता राष्ट्रीय गौरव के आधार हैं। मोदी और गांधी में अंतर यह है कि मोदी हमारी दिन-प्रतिदिन की समस्याएं सुलझाने के लिए टेक्नोलॉजी की शक्ति में भरोसा करते हैं। उन्हें भरोसा है कि मेट्रो परिवहन व्यवस्था के साथ स्मार्ट शहर नए नागरिक मूल्य स्थापित करेंगे। मैं कभी-कभी दिल्ली की मेट्रो में सवार होता हूं और मैंने इसे हमेशा स्वच्छ, शांत और कुशल पाया। इसकी वजह से अचानक अजनबियों के बीच भी रिश्ता कायम हो जाता है। मैंने देखा कि लोगों में वह मैत्री व गरिमा पैदा हो गई, जो वे आमतौर पर अपने रिश्तेदारों व मित्रों के बीच दिखाते हैं। मैं ट्रेन में बैठे हर व्यक्ति से खुद को जुड़ा हुआ महसूस करता हूं। जैसे ही मैं ट्रेन से बाहर सड़क पर आता हूं, चारों ओर वहीं गंदगी पाता हूं। अचानक मैं खुद को अलग-थलग महसूस करने लगता हूं।
इससे ज्यादा सद्भावनापूर्ण, ज्यादा मानवीय कुछ नहीं हो सकता कि गहराई में हम यह महसूस करें कि हम एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। हमें ऐसे अवसर निर्मित करने होंगे जहां लोग कंधे से कंधा भिड़ाकर काम करके एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति और आदर पैदा कर सकें। मोदी की बात में दम है, क्योंकि दिल्ली मेट्रो ने बता दिया है कि आप शहर की संस्कृति बदल सकते हैं। परिवहन का नया साधन नागरिक क्रांति लाने का शक्तिशाली जरिया हो सकता है।
जब कई ज्वलंत समस्याएं सामने हों तो कचरे के बारे में शिकायत करना अजीब लग सकता है। हालांकि, ली कुआन यू ने दुनिया को बता दिया था कि स्वच्छता के मानक पर राष्ट्र निर्माण किया जा सकता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले सिंगापुर किसी भी भारतीय शहर जितना ही गंदा था, लेकिन आज यह धरती का सबसे स्वच्छ शहर है। सिंगापुर ने बड़ी संख्या में कूड़ादान रखवाए और बहुत सारे टॉयलेट का निर्माण करवाया। इसके साथ उन्होंने जुर्माने की कड़ी व्यवस्था उतनी ही शिद्दत से लागू करवाई। कोई भी भारतीय शहर यह कर सकता है। हमारे सुधारों का यही तो निचोड़ है : संस्थाओं की प्रोत्साहन व्यवस्था को लोकहित से जोड़ा गया तो शासक और शासित दोनों का व्यवहार सुधर सकता है। हमारे सार्वजनिक स्थल गंदे क्यों हैं? यह शिक्षा का काम है या यह सांस्कृतिक समस्या है? निश्चित ही अपनी निजी जगहों पर हम तुलनात्मक रूप से स्वच्छ होते हैं। हम रोज नहाते हैं, हमारे घर साफ होते हैं और किचन तो निश्चित ही चमचमाते होते हैं। हमारी राष्ट्रीय छवि ऐसे भारतीय परिवार की है, जो बड़े गर्व से अपना घर साफ करता है और फिर गंदगी दरवाजे के बाहर फेंक देता है। इसकी संभावना नहीं है कि मोदी देश को स्वच्छ करने को लेकर हमें शिक्षित करना छोड़ दें। यदि वे चाहते हैं कि हम हमारी बची हुई जिंदगी में रोज साफ-सफाई करें, तो उन्हें अपने अगले भाषण में यह कहना होगा : मेरे हमवतन देशवासियो, यदि हम अपना दायरा घर के दरवाजे से एक मीटर आगे बढ़ा दें और उस एक मीटर में कचरा फेंकने की बजाय हम उसे चकाचक साफ कर दें तथा सारा देश ऐसा करने लगे तो भारत स्वच्छ हो जाएगा। यह कोई हवा में किला बनाने वाली बात नहीं है। विदेशों में कुछ जगह लोग घर के बाहर के फुटपॉथ रोज धोकर स्वच्छ करते हैं। एक हजार मील की यात्रा, पहले मीटर से शुरू होती है।
Sunday, October 12, 2014
An idiot-proof and swachh guide to nationalism
Swachh Bharat Abhiyan is India’s most ambitious programme to teach civic virtue to its citizens. Snatching the jhadoo from Arvind Kejriwal’s uneasy hands and Mahatma Gandhi from Congress’ anxious embrace, Narendra Modi has launched what is billed as the biggest drive in India’s history to clean the nation. He hopes to succeed in this modernizing project where the Mahatma and previous governments failed partly because of technology. In his mind, universal cleanliness is on par with universal Wi-Fi. Vikas is not only about growth rates, he says, but also about improving the quality of peoples’ lives — and clean spaces help to do that.
Frustrated by the lack of market reforms, liberals are realizing that Modi is a pragmatic modernizer, not a liberal reformer like Margaret Thatcher. He wants to transform India by changing attitudes and improving the functioning of the state — through better execution and efficient delivery of services. Without worrying about the colour of the cat (as long as it catches mice), he will reform pragmatically like Deng.
He is following Singapore’s modernizing Lee Kuan Yew, who proved that nations could be built upon an ethic of cleanliness. If India is to remain clean after the hype is over, Modi too will have to institute litter laws and deterrent fines. Cleanliness will also require relentless and persistent investments in sanitation and public health, and it will be money well spent.
Modi is lucky when it comes to vikas. While he has been circling the globe, inflation at home has been falling steadily, growth has begun to recover mildly, the trade deficit is declining, forex reserves are rising, the rupee is holding up, and thanks to the drop in oil prices and better returns expected from PSU disinvestments in a bullish stock market, it looks as though he will achieve his ambitious fiscal deficit target.
Hence, India’s credit rating has inched up, and it is now time for the RBI to cut interest rates. The RSS never fails to remind us that Indians ought to have more national pride. Modi is, however, turning the tables on the RSS by teaching that civic pride is more important. It is, in fact, a stronger, more durable foundation for nationalism. Indeed, a civic-minded citizenry is considerate of its neighbours no matter of which caste or creed. It will not tolerate campaigns like “love jihad“ which rightly lost the BJP eight out of 11 seats in Uttar Pradesh in the recent byelections. A divide is growing between the ideas of Modi and the RSS — similar to the one that grew between Atal Bihari Vajpayee and the RSS — and my bet is that the PM will prevail.
Modi is unlikely to stop tutoring us on cleaning India. By launching his campaign in Delhi’s Valmiki Colony, he realizes that India will have to negotiate the formidable reality of caste and the truth about who cleans India and who doesn’t. But smart cities will be his allies —Delhi’s Metro has shown that clean surroundings can help to create opportunities for rubbing shoulders with fellow citizens, and build empathy and respect for them. If he wants us to clean India every day for the rest of our lives, he ought to say this in his next speech: My fellow citizens, if only we would extend the circle of our concern by only one metre beyond the door or the gate of our home; if instead of throwing dirt over that alien one metre, we would absent-mindedly sweep it clean; and if all Indians did that, India would turn clean. This is not a pipe dream — in some cities abroad, citizens actually wash the footpath outside their home daily. A journey of a thousand miles begins with the first metre.
Monday, September 29, 2014
The $74m Mars mission benefits India every bit as much as clean water
To reach Mars, Mangalyaan (or “Mars craft” in Hindi) had initially to execute a complex slingshot trajectory, swinging around the Earth several times to generate speed using the planet’s gravity field. Once it arrived at its destination, its dormant systems and engines were awoken, programming delicate remote manoeuvres while the craft operated on battery power on the planet’s dark side. It was not the shoestring budget alone but also the quality of the pictures transmitted that excited scientists around the world.
Many argue the money would have been better spent on clean water and toilets in what remains in many places a desperately poor country,and they have a point. But in assuming that spending on space is a hobby of rich countries alone, they fail to realise that nation building entails the memory of heroic achievements such as this one, which will go on to inspire generations of children to pursue careers in pure and applied sciences.The value of this inspiration is incalculable in developing the sort of talent that can disproportionately benefit a nation.
The investment in the project was less than the $100m budget for the film Gravity, or even a Bollywood blockbuster. How did Indian scientists succeed so economically? It is not simply that people costs are lower, or that homemade technologies are cheaper than imports. It is because project managers focused on a few crucial objectives and executed them brilliantly. This is what impresses international scientists such as Britain’s Professor Andrew Coates, who will be a principal investigator on Europe’s 2018 Mars rover mission.
Mangalyaan will confine itself to measuring methane in the atmosphere, perhaps the most important research subject because it relates to the possibility of life on Mars. Western scientists are excited over the Indian probe, since it will dovetail nicely with US and European efforts. “It means we’ll be getting three-point measurements, which is tremendous,” says Prof Coates.
No one understands the modernising value of the Mars mission better than Narendra Modi, India’s prime minister. In a society beset by middle-class insecurities, science is increasingly neglected in favour of more practical careers in business, law and engineering. This is a valuable chance to revive its popularity. This mission reminded the nation of an earlier generation that had produced outstanding scientists, some of them Nobel Prize winners, who are remembered for world-famous contributions such as the Raman effect, the Saha equation and the Chandrasekhar Limit. As Mangalyaan entered the red planet’s orbit last week, Mr Modi urged every college and school to spend five minutes savouring the moment, just as they would a cricket victory.
The next day he launched his “Make in India”campaign, aimed at persuading companies to invest in the country and at bolstering its unsuccessful manufacturing industry. The satellite’s success was the result of a “can do” attitude, he said.
More of that approach is needed in a country that has performed below its potential,too often held back by red tape and corruption. The Mars mission has provided at least a temporary boost to the image of India’s public sector. It is reassuring to Mr Modi, who has disappointed liberals like me, frustrated by the lack of market reforms. We are beginning to realise that Mr Modi is a pragmatic, nationalist moderniser, not a liberal reformer such as former UK prime minister Margaret Thatcher. He plans to transform India by improving the functioning of the state–through better execution and efficient delivery of services. Like China’s Deng Xiaoping, he will reform pragmatically–without worrying about the colour of the cat, as long as it catches mice.
Wednesday, September 24, 2014
लव जेहाद नहीं, मॉडर्न मिशन जरूरी
कई लोग मानते हैं कि भाजपा ने ‘लव जेहाद’ जैसी अजीब-सी बात फैलाकर आत्मघाती गोल कर लिया है। पार्टी के उत्तरप्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी इसे लेकर ज्यादा ही आगे बढ़ गए और जब तक नई दिल्ली का नेतृत्व उनकी खिंचाई करता, बहुत देर हो चुकी थी। ‘लव जेहाद’ और योगी आदित्यनाथ के अतिवादी बयानों ने राज्य का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कर दिया और समाजवादी पार्टी ने मुस्लिमों का संरक्षक बनकर इस स्थिति का फायदा उठा लिया। भाजपा यह भूल गई कि उसने उत्तरप्रदेश की 80 में से 71 लोकसभा सीटें अच्छे शासन और आर्थिक विकास के वादे पर जीती थीं, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बल पर नहीं।
‘लव जेहाद’ यह जुमला भारतीय शब्दावली में 2009 में आया जब केरल व कर्नाटक में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण की खबरें आईं। हिंदू राष्ट्रवादियों ने दावा किया कि मुस्लिम पुरुष फुसलाकर हिंदू लड़कियों से विवाह कर उनका धर्म बदल रहे हैं। इसके पीछे भारत को मुस्लिम बहुसंख्या वाला देश बनाने का दीर्घावधि लक्ष्य है। तब दो मुस्लिम युवकों को इस आरोप में जेल में डाल दिया गया था कि उन्होंने यूनिवर्सिटी की दो गैर-मुस्लिम छात्राओं को िववाह का वादा कर धर्मांतरण के इरादे से फांस लिया। अदालत में दोनों युवतियों ने मुस्लिम युवाओं के खिलाफ गवाही दी। एक युवती ने बताया कि वह कॉलेज में वरिष्ठ छात्र के प्रेम में पड़कर उसके साथ भाग गई थी। उन्हें विवाह अपेक्षित था, लेकिन इसकी बजाय मुस्लिम केंद्र ले जाया गया, जहां उनका इस्लामी अतिवादी प्रचार से सामना हुआ। केरल हाईकोर्ट ने पुलिस से इन शिकायतों की जांच करने को कहा। पुलिस जांच का निष्कर्ष यह था कि कुछ असामाजिक पुरुषों द्वारा ऐसी घटनाएं अंजाम देने की इक्का-दुक्का घटनाएं हुई हैं, लेकिन धर्मांतरण के उद्देश्य से व्यापक साजिश के कोई सबूत नहीं मिले।
उत्तरप्रदेश में भी पुलिस को पिछले तीन माह में मिली ‘लव जेहाद’ की छह में से पांच रिपोर्टों में बलपूर्वक धर्मांतरण या इसके प्रयास के कोई सबूत नहीं मिले। प्रदेश के पुलिस प्रमुख एएल बनर्जी ने बताया ‘ज्यादातर मामलों में हिंदू युवती व मुस्लिम युवक के बीच प्रेम था और उन्होंने परिवार वालों की मर्जी के खिलाफ विवाह किया था। ये लव मैरिज के मामले थे लव जेहाद के नहीं।’ मुझे तो लव जेहाद कुछ हिंदू राष्ट्रवादियों की अति-सक्रिय और आत्म-विश्वासहीन कल्पना की उपज लगता है।
चूंकि मतदाता मूर्ख नहीं हैं, भाजपा को हाल के उपचुनाव में इसका खमियाजा भुगतना पड़ा। वास्तविक जोखिम तो यह है कि लव जेहाद जैसी मूर्खताएं मुस्लिमों को और अलगाव का अहसास कराएंगी और वे पाकिस्तान में बैठे अल कायदा के कमांडर अयमान अल-जवाहिरी और मध्यपूर्व के इस्लामिक स्टेट की अपीलों के शिकार बन सकते हैं। हमें तो संघ परिवार के काल्पनिक लव जेहाद की बजाय इन आतंकवादियों के लव-लैस जेहाद की ज्यादा चिंता करनी चाहिए।
लव जेहाद की फैंटेसी के पीछे पितृसत्तात्मक व्यवस्था का पुरातनपंथी विचार है, जिसमें महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति समझा जाता है और संपत्ति की रक्षा करना पुरुषों का दायित्व। ज्यादातर परंपरागत धर्मों में यह विचार पाया जाता है, लेकिन 21वीं सदी में महिलाओं के बारे में ऐसा सोचना उनका अपमान है। लव जेहाद के पीछे महिलाओं के बारे में यह नकारात्मक विचार है कि वह जिम्मेदार नहीं है, उसकी अपनी कोई सोच नहीं होती और इसीलिए उसे पुरुषों के संरक्षण की जरूरत है। यदि हमें आधी आबादी की कोई परवाह है तो हमें इस पुरुषवादी मानसिकता पर प्रहार करना चाहिए, जो महिला को अधीनता में रखना चाहती है। धर्मशास्त्रों के जरिये इस मानसिकता को हजारों वर्षों में खाद-पानी मिला है। मनु कहते हैं कि स्वभाव से ही महिलाएं चंचल, बुरी और इच्छाओं के वशीभूत होती हैं। ‘स्त्रीधर्मपद्धति’ के लेखक त्र्यंबक जोर देकर कहते हैं कि महिलाएं वफादार नहीं होतीं, उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता और उन्हें लेकर सचेत रहना पड़ता है। किंतु शास्त्रों को इस बात का भी अहसास है कि महिला में मातृत्व के गुण हैं और परिवार बनाने व पुत्र होने के लिए वे आवश्यक हैं। इस प्रकार महिला के बेलगाम स्वभाव (स्त्रीभावना) और परिवार व समाज की आवश्यकताओं के बीच द्वंद्व है, इसलिए धर्मशास्त्रों ने ‘स्त्री-धर्म’ यानी परिवार व समाज के प्रति उसके कर्तव्य सिखाने और उनमें जिम्मेदारी की भावना विकसित करने का फैसला किया। यह सीख देने की कोशिश की कि अविवाहित महिला का कर्तव्य है पवित्र बने रहना और विवाहित महिला को पति के प्रति वफादार रहना चाहिए।
इस मानसिकता का नतीजा यह होता है कि जिस दिन बेटी युवावस्था में पहुंचती है, परंपरागत भारतीय परिवार नैतिक संत्रास में पहुंच जाता है। उस दिन के बाद पालक धीमी आवाज में योग्य लड़का खोजने के बारे में बातें करते हैं ताकि उसकी शादी कर दी जाए। अपनी जाति का लड़का हो तो बेहतर। यदि वे ब्राह्मण हैं तो वे उसे वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर में पूजा के लिए ले जाते हैं ताकि उसे योग्य वर मिल सके। लड़कियां पालकों को खुश रखने के लिए सोमवार का व्रत रखने लगती हैं, लेकिन आयु बढ़ने के साथ वह कॉलेज जाती है और वहां उसे आकर्षक युवा दिखाई देते हैं। रोमांस फलता-फूलता है और प्राय: प्रेम विवाह हो जाते हैं। युवती खुद ही युवक के साथ भाग जाने का निर्णय तक ले सकती है।
देश को खतरा बाहर से नहीं, भीतर से है। भारतीय मुस्लिम दुनिया का सबसे कम कट्टर मुस्लिम है। यह भारत के लोकतंत्र और हिंदू धर्म की बहुलता का असर है। भारत का इस्लाम भी उतना कट्टर नहीं है और यह गुणवत्ता में सूफी जैसा है। आरएसएस और संघ परिवार हिंदू धर्म का इस्लामीकरण करने का प्रयास कर रहे हैं और इसे कट्टर बना रहे हैं। वे भारत को तकलीफ में फंसे पाकिस्तान में बदलना चाहते हैं। लव जेहाद और इस जैसी पागलपनभरी बातों से मुस्लिम असुरक्षित महसूस करने लगेगा और अयमान अल-जवाहिरी और आईएसआईएस के बहकावे में उसके आने की आशंका बढ़ेगी। मोदी की जिम्मेदारी है कि वे इस भटकाव को रोकें ताकि वे चुने जाने के बाद किए अपने तीन वादे पूरे कर सकें- रोजगार पैदा करना, महंगाई पर लगाम लगाना और भ्रष्टाचार रोकना। लोगों ने भाजपा को विकास और सुशासन के लिए चुना है, लव जेहाद में पड़ने के लिए नहीं।
Saturday, September 13, 2014
मजबूत नेतृत्व का असर
भारत के लोगों ने नरेंद्र मोदी का चुनाव बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन करने, बेहतर शासन देने और महंगाई पर लगाम लगाने के लिए किया। अभी यह कहना बहुत जल्दबाजी होगी कि वह इन तीनों ही वादों को पूरा कर सकेंगे। उनके कार्यकाल के शुरुआती तीन-साढ़े तीन माह यही दर्शाते हैं कि वह किस तरह इन लक्ष्यों को पूरा करना चाहते हैं। लोगों की अपेक्षाओं को देखते हुए सरकार को बहुत सजग रहना होगा। आज की तिथि तक मोदी का उल्लेखनीय योगदान यही है कि सरकार में सभी स्तरों पर कार्यो के निपटारे में चमत्कारिक सुधार आया है। कांग्रेस शिकायत कर रही है कि मोदी सरकार के पास नए विचारों का अभाव है और वह संप्रग सरकार के विचारों की नकल कर रही है। हालांकि सच्चाई यही है कि विचार किसी के भी पास हो सकते हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन कुछ लोग ही कर सकते हैं।
जो लोग मोदी सरकार द्वारा बड़े सुधार न किए जाने से निराश हैं वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि भारत की सबसे बड़ी समस्या विचारों, नीतियों और कानूनों का अभाव नहीं, बल्कि इनका खराब क्रियान्वयन है। क्रियान्वयन में कमजोरी ही वह मुख्य कारण जिससे भारत की विकास दर पिछले तीन वर्षो में गिरती गई। पहले दिन से ही मोदी ने अपेक्षाओं को काफी ऊंचा रखा। उन्होंने सुरक्षित रास्ते का अनुसरण करने से इन्कार किया और इस वर्ष के लिए राजकोषीय घाटे पर नियंत्रण पाने का ऊंचा लक्ष्य तय किया और कहा कि वह इसे हासिल कर सकते हैं। वह निर्धारित लक्ष्य हासिल कर पाएंगे, इसमें संदेह है, लेकिन उद्देश्य को लेकर एक नई सोच आई है तथा केंद्र समेत तमाम राज्यों और यहां तक कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के रुख में स्पष्ट बदलाव परिलक्षित होने लगा है। इसका प्रमाण प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप अथवा परियोजना निगरानी समूह के गठन से लगाया जा सकता है, जो सैकड़ों की संख्या में रुकी पड़ी परियोजनाओं के अवरोधों को हटाने का प्रयास करेगा। इससे केंद्रीय मंत्रालयों के अधिकारी, राज्य सरकारें और बिजनेस वर्ग भी काफी उत्साहित है। हालांकि इसका गठन पहले ही हो गया था, लेकिन इस समूह को ऊर्जा तब मिली जब मोदी सत्ता में आए। ऐसी रिपोर्ट हैं कि पिछली सरकार में जो अधिकारी परियोजनाओं को रोकने में बाधक बन रहे थे और उदासीन रवैया अपनाए हुए थे अब वही अधिकारी जोशपूर्वक इन्हें आगे बढ़ा रहे हैं और लंबित परियोजनाओं को स्वीकृति दे रहे हैं।
अब चुनौतियां और बाधाएं खत्म हो रही हैं। एक समय इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं वर्षो तक रुकी रहने के कारण उद्यमी दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गए थे और बैंकों को भी काफी नुकसान उठाना पड़ता था। स्थिति कुछ ऐसी थी कि पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी मिलने के बाद भी बैंक वित्तीय मदद देने से इन्कार कर देते थे। नए भूमि अधिग्रहण कानून ने भी तमाम मुश्किलों को खड़ा करने का काम किया। तमाम राज्यों ने जानकारी दी कि नया कानून अस्तित्व में आने के बाद सभी तरह की भूमि की खरीद-बिक्री का काम बुरी तरह प्रभावित हुआ है। जब आप सैकड़ों की संख्या में रुकी परियोजनाओं के संदर्भ में इस समस्या का आकलन करते हैं तो आप सोचने को विवश होंगे और संप्रग सरकार की घटिया विरासत को लेकर देश की दुर्दशा पर रोएंगे या दुखी होंगे। इस मामले में हमें एक नई सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार करने वाली मोदी सरकार को धन्यवाद देना चाहिए कि उसने हाथ खड़े करने के बजाय अधिकारियों को उत्तर खोजने के लिए प्रेरित किया और नतीजा यह हुआ कि सब कुछ चलता है की प्रवृत्ति वाले नौकरशाह अब उल्लेखनीय काम कर रहे हैं। मोदी द्वारा हाथ में ली गईं महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की दिशा में एकल खिड़की का प्रावधान बड़ा बदलाव लाने में सहायक होगा। भारत में कोई उद्योग शुरू करने के लिए तकरीबन 60 क्लीयरेंस लेने की जरूरत पड़ती है, इनमें से 25 केंद्र के स्तर पर और 35 राज्य स्तर पर होती हैं, लेकिन डिजिटलीकरण के बाद यह सारे काम एक ही परियोजना निगरानी समूह द्वारा संभव होंगे। पूर्ण डिजिटलीकरण के बाद उद्यमी इसके लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकेंगे और अपने काम की प्रगति की जानकारी इंटरनेट पर देख सकेंगे। इससे यह भी पता चलेगा कि कौन अधिकारी फाइलों को रोक रहा है। इस तरह उद्यमियों के लिए एकल खिड़की का सपना साकार हो सकेगा। तीव्र क्रियान्वयन से रोजगार सृजन भी तेज होगा। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में नियुक्तियों में 20 फीसद की बढ़ोतरी हुई है जो पिछले पांच वर्षो में बेहतरीन प्रदर्शन है।
मोदी भाग्यशाली रहे कि अप्रैल से जून तिमाही में जीडीपी विकास दर बेहतर रही। यह अर्थव्यवस्था में बढ़ोतरी और उच्च विकास को दर्शाती है। स्पष्ट है कि रोजगार का अधिक सृजन होगा। मोदी को तेज क्रियान्वयन के खतरे के प्रति भी सजग रहना होगा। जन-धन योजना एक बेहतरीन कार्यक्रम है, जिससे सभी भारतीयों को बैंक खाते की सुविधा मिलेगी और निर्धन वर्ग से संबंधित योजनाओं के लिए नकदी हस्तांतरण के माध्यम से बड़ी मात्रा में सरकारी धन की बचत होगी। हालांकि यह योजना बैंकों पर अत्यधिक निर्भर है, जो गरीबों का खाता खोलने के लिए बहुत इच्छुक नहीं हैं। बैंक तभी रुचि लेंगे जब सब्सिडी की वर्तमान व्यवस्था को खत्म किया जाए और धन का प्रवाह गरीबों के लिए खुले इन खातों में किया जाए। इसमें समय लगेगा।
जहां तक मोदी की ओर से शासन में सुधार, क्लीयरेंस में पारदर्शिता के माध्यम से जवाबदेही के वादे की बात है तो निश्चित रूप से इससे लालफीताशाही खत्म होगी। सिंगापुर, अमेरिका जैसे तमाम देशों में बिजनेस शुरू करने में 3 से 5 दिन लगता है, जबकि भारत में 75 से 90 दिन। इसी कारण बिजनेस रैंकिंग रिपोर्ट में भारत का स्थान 134वां है। तीसरा मुद्दा महंगाई पर नियंत्रण का है। मोदी सरकार अतिरिक्त पड़े भंडारों से खाद्यान्नों को बेच रही है जिससे इनके दाम गिरे हैं, लेकिन यदि आयात शुल्क घटाए जाते हैं और महत्वपूर्ण खाद्यान्नों व सब्जियों आदि पर से गैर टैरिफ बाधाओं को खत्म किया जाता है तो वह इस तीसरे लक्ष्य को भी हासिल कर सकेंगे। पेट्रोलियम पदार्थो के दाम कम हुए हैं और मानसून का बहुत खराब न रहना मोदी के लिए लाभदायक है। यदि वह सरकारी खर्चो में कटौती कर सके तो महंगाई और कम होगी। ध्यान रहे संप्रग सरकार में सरकारी खर्च महंगाई बढ़ने की एक मुख्य वजह थी।
मोदी कार्यकाल के तीन महीने बताते हैं कि कैसे एक प्रभावी नेतृत्व बेहतर क्रियान्वयन के माध्यम से सरकार की क्षमता को बढ़ा देता है। कम महंगाई के साथ उच्च विकास को बनाए रखने के लिए मोदी को दूसरी पीढ़ी के आर्थिक सुधारों पर अमल करना होगा। भ्रष्टाचार पर प्रहार करने और बेहतर शासन के लिए उन्हें नौकरशाही, पुलिस और न्यायपालिका में सुधार करना होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात, मोदी को केसरिया ब्रिगेड पर नियंत्रण करना होगा, जो उनके तीन वादों को पूरा करने में अनावश्यक अड़चन पैदा कर सकती है।
Sunday, September 07, 2014
Cautious optimism is the verdict on Modi’s 100 days
Monday, August 25, 2014
उम्मीद जगाने वाले 10 कदम
Friday, August 15, 2014
बदलाव की बड़ी तस्वीर
मोदी सरकार को सत्ता में आए करीब ढाई माह हो चुके हैं। इतने कम समय में किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचना अभी बहुत जल्दबाजी होगी, लेकिन बदलाव के संकेत दिखने लगे हैं और एक बड़ी तस्वीर स्पष्ट होने लगी है। हां, इतना अवश्य है कि जहां लोगों को आमूलचूल बड़े परिवर्तन की अपेक्षा थी वहां निरंतरता पर आधारित छोटे-छोटे बदलाव नजर आ रहे हैं। बजट में बहुत बड़े बदलाव की अपेक्षा पाले बैठे लोगों को भी कुछ निराशा हुई है। इसी तरह जो लोग अनुदार हिंदू तानाशाही के उभार का डर पाले हुए थे वे ऐसा कुछ न होने के प्रति आश्वस्त हुए हैं। प्रधानमंत्री न तो अधिक तेजी से अपने प्रशंसकों की तमाम बड़ी अपेक्षाओं को पूरा कर सकते हैं और न ही अपने दुश्मनों के डर को समूल खत्म कर सकते हैं। इससे पता चलता है कि भारत में किस तरह सत्ता का संचालन होता है। इस निरंतरता की सकारात्मक व्याख्या यही है कि यह भारतीय राज्य के दिनोंदिन अधिक परिपक्व होने को दर्शाता है। इसका नकारात्मक पहलू यह है कि मोदी भी शासन में रातोंरात बड़ा बदलाव शायद नहीं कर सकते। प्रधानमंत्री ने स्वयं भी इससे अपनी मौन सहमति जताई है। वह अधूरे पड़े कामों को पूरा करने में जुटे हैं और यह कोई खराब बात नहीं है। जैसा कि वह कहते भी हैं कि काम करने वाले ज्यादा बोलते नहीं।
इस सरकार द्वारा किए गए थोड़े बहुत किए गए कार्य यही बताते हैं कि मोदी सरकार का मंत्र मौन क्रियान्वयन है। इस संदर्भ में जो महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है वह केंद्रीय नौकरशाही के रुख-रवैये से संबंधित है। रिपोर्ट बताती हैं कि वही पुराने अफसर आम लोगों से अधिक आसानी से मिल रहे हैं, उनके फोन उठा रहे हैं और काम कर रहे हैं। समय पर मीटिंग हो रही हैं और यहां तक कि सुबह के नौ बजे भी अधिकारी बैठक कर रहे हैं। इराक में युद्ध क्षेत्र से जिस तरह 48 घंटों के भीतर केरल की नसरें को वापस उनके घर पहुंचाया गया वह प्रशासन के नए तौर तरीकों को दर्शाता है। दूसरा काम बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं में तेजी दिखाने का है, जिससे नए रोजगार अवसरों के सृजन की शुरुआत हुई है। तीसरा संकेत विदेश मंत्रालय में आए नए उत्साह और उद्देश्यपरकता का है। पड़ोसी देशों से संबंध सुधारे जा रहे हैं, जिससे हमारी सुरक्षा सुदृढ़ होगी। नेपाल, बांग्लादेश और भूटान के लोगों का नजरिया भारत के प्रति बदला है। इसी तरह एक और बड़ा प्रशासनिक बदलाव लोगों को प्रमाणपत्रों के प्रशासनिक अधिकारियों के द्वारा सत्यापन से निजात दिलाना है। अब जन्म प्रमाणपत्र, अंकपत्र आदि के सत्यापन के लिए राजपत्रित अधिकारियों के हस्ताक्षर अथवा नोटरी से हलफनामे की आवश्यकता नहीं होगी। आप गांवों में रहने वाली उन विधवाओं के बारे में कल्पना कीजिए जो सरकारी लाभ पाने के लिए एक अधिकारी से हस्ताक्षर कराने के लिए पूरे दिन यात्रा करने को विवश होती हैं और इसके लिए अंतत: उन्हें रिश्वत देनी पड़ती है। वास्तविक दस्तावेजों की आवश्यकता अब भी होगी, लेकिन लालफीताशाही खत्म होगी और ब्रिटिश राज की औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति मिलेगी।
इस क्त्रम में श्रम से संबंधित तीन बड़े सुधार किए गए हैं। हालांकि सरकार द्वारा इस दिशा में उठाए गए कदम पर्याप्त नहीं हैं, लेकिन इससे श्रम कानून में सुधार का रास्ता खुला है। इन सुधारों से कर्मचारी लाभान्वित होंगे और उद्योग-व्यापार कार्य अधिक आसान बनेगा। कंपनियों को नए कर्मचारियों की भर्ती करने में आसानी होगी और नियोक्ता नए लोगों को कौशल प्रशिक्षण देने के लिए प्रोत्साहित होंगे, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में। इसी तरह निरीक्षणों के संबंध में श्रम मंत्रालय के नए कानूनों से छोटी विनिर्माण इकाइयों को श्रम निरीक्षकों के भय से निजात मिलेगी। हमारे निरीक्षकों को याद होना चाहिए कि यह प्रणाली 1880 में अपनाई गई थी। उस समय निरीक्षण के दो प्रकार थे। एक संदिग्ध के खिलाफ, जिसमें उसकी खामियों-कमियों को खोजा जाता था ताकि उन्हें ठीक किया जा सके। दूसरा काम मित्रवत मार्गदर्शन का था, जिसकी सदिच्छा चीजों को ठीक करने की होती थी। यह सही है कि भ्रष्ट श्रम निरीक्षक रातोंरात बदल नहीं जाएंगे, लेकिन उनके व्यवहार को अब कड़ाई से नियंत्रित अवश्य किया जा सकता है। जहां तक महंगाई की बात है तो सरकार ने एफसीआइ के गोदामों में पड़े 50 लाख से एक करोड़ टन खाद्यान्नों को बेचने की बात कही है। महज इसकी घोषणा से बाजार में खाद्यान्न कीमतों में गिरावट आ गई। इस कदम को दूसरी अन्य महत्वपूर्ण चीजों के मामले में भी अपनाया जा सकता है। सब्जियों के मामले में भी अधिक तेजी से हवाई जहाजों के माध्यम से रणनीतिक आयात के द्वारा सरकार आपूर्ति बढ़ाकर महंगाई को नियंत्रण में ला सकती है। कृषि उत्पाद बाजार समितियों अथवा एपीएमसी के एकाधिकार को खत्म करने के लिए निजी किसान मंडियों का सहारा लिया जा सकता है। बजट में शीतभंडारण गृहों की श्रृंखला स्थापित करने की बात कही गई है, इससे किसानों को लाभ होगा और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमत में कमी आएगी।
संप्रग सरकार के समय में शुरू की गई आधार योजना अधिक तर्कसंगत बनाने की बात कही गई है, जो अच्छा कदम है। भुगतान के लिए बायोमीट्रिक तकनीक को मोबाइल फोन से जोड़े जाने से हजारों करोड़ की बचत होगी। इस तरह जवाबदेह प्रशासनिक कामकाज से आम लोगों को लाभ होगा। कुछ नकारात्मक बातें भी हुई हैं। मेरे विचार से डब्ल्यूटीओ वार्ता में भारत को विघ्नकर्ता की भूमिका नहीं निभानी चाहिए। भारत कृषि का बड़ा निर्यातक देश है और यह हमारे हित में है कि लालफीताशाही कम हो और सीमा शुल्क संबंधी औपचारिकताएं तर्कसंगत हों। भारत कमजोर बहुपक्षीय प्रणाली को कमतर आंक रहा है, जिससे अंतत: हमें ही सर्वाधिक लाभ होना है। कुल मिलाकर मोदी सरकार के कामों और उनकी कार्यशैली को देखते हुए हम कह सकते हैं कि नया मंत्र मौन क्रियान्वयन है। बहुत अधिक बातें और काम बहुत थोड़ा करने वाले हमारे देश में यह कार्यप्रणाली एक ताजी हवा की तरह है। जो लोग 15 अगस्त को प्रधानमंत्री से एक दूरदर्शी भाषण की अपेक्षा कर रहे हैं उनका इंतजार आज खत्म होगा।
Sunday, August 03, 2014
Two months on, mantra’s clear: Less talk, more action
Tuesday, July 15, 2014
कई बातें स्पष्ट कर सकते थे जेटली
Tuesday, July 08, 2014
After months of talk, it’s go time for new PM
Modi’s landslide victory invites us to be more imaginative in thinking about the nature of human dignity , to move from prejudice to a question. By electing a chai-wallah’s son, who affirmed the aspirations of the millions who have pulled themselves up in the post-reform decades through their own efforts into the middle-class, we are forced to challenge our assumption that selling vegetables is socially degrading. If an upper-class zamindar, who takes time off from his idle life of breeding race horses to stand behind a counter in the belief that supplying people with good vegetables at a fair price, or driving them to their destination in a three-wheeler, is inherently worthwhile, the prejudice might give way to a fairer assessment of human worth.
Ruskin is not only challenging how we judge shopkeepers; he also wants shopkeepers to take their own dignity more seriously . Modi’s victory has made us believe that: 1) anyone can aspire to middle-class status; 2) if one imbibes its values of thrift, ambition, industry and prudence; and 3) a middle-class society is a good society.
Narendra Modi has now been prime minister for six weeks and it is abundantly clear that this is a “Modi Sarkar“. He has established direct contact with secretaries at the head of government departments, encouraging them to take decisions and get in touch with him if things go sour. Ministers have an ambiguous place in this setup, which is probably a good thing considering the mediocre level of his cabinet. Ministers could not be happy -they have been forbidden to hire relatives or introduce personal considerations in their decisions.
Otherwise, this has been a period of welcome silence and calm after the din and clatter of the election. Now we need to see some action after months of talk. In one respect Modi should not be silent. He should learn from his predecessor’s mistake and insistently make a compelling political case for economic reform. He must keep educating Indians about the link between reforms, jobs, opportunities and prosperity . He needs to explain that only the competitive market (not giveaways) can deliver a middle-class society and that a rules-based capitalism leads to dignity, not crony capitalism. Unfortunately, he frittered away a golden opportunity to do this in the disappointing address of the President.
Modi has spoken about “tough“ decisions that are urgently needed to enforce financial discipline, and they risk losing popular good will. With this warning he has set the stage for a hard-nosed budget on Thursday. When it comes to price increases, he would do well to follow TN Ninan’s advice -take price increases in small bites and frequently, and avoid the fiasco over the increase in railway fares.
Achche din aane wale hain (Good days are coming), was Modi’s response to his victory.
Those few words carry a massive burden of aspirations but with a clear majority in the Lok Sabha and supremacy in his own party , he is the first Indian leader in a long time to have the freedom to act on his convictions. He is getting plenty of advice -the politico-bureaucratic system is trying to co-opt him, attempting to make him one of its own. He is being advised to be prudent, to make incremental changes and not unsettle the system. But he must not forget that an aspiring nation has elected him precisely because he is an outsider and wants him to shake up the system. So, he must not listen too much to others and follow his own dharma.
Friday, June 20, 2014
It Is All about Execution
If there is one lesson we have learned about leadership in recent years, it is that we overvalue intelligence and undervalue determination. When choosing our leaders we betray an instinctive bias for thought over action even though history teaches us that great leaders were great doers, not great thinkers. Outstanding leaders have always had the qualities of resolve, purpose and determination in abundance, and this helped them to change the world. With a PhD from Oxford University, our last prime minister was probably the leader most generously endowed with intelligence and academic credentials. But he failed. He neither had the willpower to prevail over events, nor the ability to translate thought into action. Sickened by the drift and paralysis of the last government, the Indian voter has now chosen the opposite type of leader.
Narendra Modi's defining qualities are a sense of purpose, accompanied by attention to detail, and backed by plenty of grit and fierce determination. These are quintessential abilities of an implementer, someone who knows how to get things done. These qualities were on generous display during his election campaign and if he runs the country as well as his campaign we have good reasons to be hopeful. The answers to India's problems have less to do with new ideas and new laws and more to do with implementing old ideas and old laws. Modi reminded us of this truth time and again during the past year, and those who know him well have said the same thing-his strength lies in execution. It is time we had an executive in charge of our country, someone capable of delivering results. It is for this reason that I-a liberal, secular Indian who does not find Hindutva or BJP particularly appealing-voted for him.
Indians do well in strategy, lag in execution
McKinsey & Co, the respected management consulting company, discovered in a famous global study in the 1990s that high performing companies distinguished themselves by execution. Its data on India reinforced the bias for action. In its sample of 35 major Indian companies, based on interviews with more than 600 executives, it concluded: "While many Indian companies perform well on strategy, they are lagging in execution.
Foreigners sometimes remind us that Indians are bright. But they are too polite to add that they can also be 'over-smart'. Indians think and argue too much, see too many angles, and don't act enough. It makes hiring and recruiting talent particularly difficult, for we come out sounding good in interviews, and how do you separate the doers from the talkers? The gap between thought and action is so pervasive in Indian life that I sometimes despair if weak execution is, in fact, a deficit in character.
My experience as a practising manager and later as a board member or consultant confirms that while most managers usually achieve a reasonably robust strategy, they implement poorly. I am also associated with a private equity fund that has invested in many Indian companies over the past 10 years, and it has reinforced this conclusion: The best firms are not the ones with the best business model but the best execution ability.
The story of Narendra Modi's climb from serving chai to passengers on the railway platform of a sleepy Gujarat town to 7, Race Course Road illustrates many things, including his leadership style. As he rose in life to take on positions of increasing responsibility in the RSS and later in the Gujarat government, Modi was not content with laying broad policies. Unlike our previous prime minister, he did not abdicate responsibility for implementation to those below him. He surrounded himself with people with execution ability like himself, set clear, measurable goals, and created small 'implementation' teams. Instead of pronouncing on strategy, he got into the messy details of a project, monitored day-to-day performance, removing obstacles for those who were implementing it, staying close to them and motivating them. He recognised those who took initiative and risks, and punished those who played safe and behaved like bureaucrats. And he did all this without appearing to be interfering or micro-managing. Thus, he got fairly ordinary Gujaratis to do pretty extraordinary things.
I first heard Narendra Modi speak at Shri Ram College of Commerce in Delhi in February 2013, and it opened a window to his leadership abilities. It was his first speech in a long campaign to be prime minister, and he declared his ambition right away. Unlike coy Rahul Gandhi and the Congress party, who danced coquettishly around the subject, Modi sent an unambiguous message that he was hungry for the job. He was off to a head start, and his clarity of purpose was refreshing for the Indian voter.
Modi was also unambiguous about his specific goal-it was to gain a clear majority for the BJP. The chattering classes laughed each time he said it and thought he was mad. They did not know that impossible ambitions drive successful leaders. Managers call these 'stretch' targets, and their purpose is to rally troops around difficult tasks. Impossible targets have a way of motivating soldiers who forget their differences. They feel they 'own' the goal and the battle. Thus, charismatic leaders are known to achieve astonishing commonness of purpose among their subordinates-what business managers prosaically refer to as 'alignment'.
Great leaders are not nice people
Related to this, was another feature I observed about Modi's campaign-the importance of a unified team. Great leaders are not 'nice' people who seek popularity, and certainly not ones you would invite to a polite dinner party. Narendra Modi had to ensure unified command and had to get rid of rivals and sceptics, which explains why he had to marginalise L.K. Advani, Jaswant Singh and others. And why, at the same time, he had to move his most trusted lieutenant, the ambiguous Amit Shah, to perform the miracle of turning Uttar Pradesh around. And why, despite opposition from inside the party, he tied up with unsavoury, blemished politicians B.S. Yeddyurappa and Ram Vilas Paswan.
The word executive comes from 'one who executes'. The hallmark of an effective executive is good planning and attention to detail, which is an important lesson I learned at the company where I worked for many years, Procter & Gamble. (The other lesson was how to write a crisp one-page memo because you were not allowed a second page). Modi, as I have said, is an implementer, and hence planning and detail come naturally to him. What we saw on television was great oratory but behind the scenes was months of planning with dozens of karyakartas, who worked with discipline to orchestrate each event minute by minute.
Finally, Modi is a flawed individual, not unlike most of us. In his place, I would have expressed remorse a dozen times for the events in 2002, without of course, incriminating myself. I would have had a powerful think tank to feed me data, especially on economic and foreign policy issues. I could go on and on about his deficits. But at the end, his positive attributes clearly outweigh his faults. If there is one truth I would underline it is that without realising it, Narendra Modi seems to follow the British scientist Jacob Bronowski's advice. He believes that the world is not understood by contemplation but by action-"the hand is the cutting edge of the mind, as Bronowski put it.
